डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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Blog posts : "ज़िंदगी का रंग फीका था मगर इतना न था"

ज़िंदगी का रंग फीका था मगर इतना न था

January 25, 2016 at 00:23

ज़िंदगी का रंग फीका था मगर इतना न था

इश्क़ में पहले भी उलझा था मगर इतना न था

 

क्या पता था लौटकर वापस नहीं आएगा वो

इससे पहले भी तो रूठा था मगर इतना न था

 

दिन में दिन को रात कहने का सलीका देखिये

आदमी पहले भी झूठा था मगर इतना न था

 

अब तो मुश्किल हो गया दीदार भी करना तिरा

पहले भी मिलने पे पहरा था मगर इतना न था

 

उसकी यादों के सहारे कट रही है ज़िंदगी

भीड़ में पहले भी तन्हा था मगर इतना न था

 

टुकड़ा टुकड़ा हो गया है ज़िंदगी का आईना

इससे पहले भी मैं टूटा था मगर इतना न था

 

उसके जाने से बढ़ी 'सूरज' मेरी तिष्नालबी

प्यार के दरिया में प्यासा था मगर इतना न था

 

डॉ सूर्या बाली 'सूरज'

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