डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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Blog posts : "घूमता हूँ मै अकेला ग़म के मारों की तरह"

घूमता हूँ मै अकेला ग़म के मारों की तरह

घूमता हूँ मै अकेला ग़म के मारों की तरह।

ज़िंदगी तेरे बिना लगती है ख़ारों की तरह ॥


चोट करती हैं तेरी यादों कि लहरें रात दिन,

टूटता रहता हूँ दरिया के किनारों की तरह॥


हो रही बरसात मुझपे रौशनी की आजकल,

आप आए ज़िंदगी मे चाँद-तारों की तरह॥   


खिल गईं है सारी कलियाँ मुस्कराया ये चमन ,

जब से आयें हैं वो गुलशन मे बहारों की तरह॥


वो तुझे कुछ भी कहे “सूरज”, मगर मेरे लिए,

है तेरा एहसास सावन की फुहारों की तरह॥

   
                                डॉ॰ सूर्या बाली “ सूरज”

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घूमता हूँ मै अकेला ग़म के मारों की तरह

घूमता हूँ मै अकेला ग़म के मारों की तरह।

ज़िंदगी तेरे बिना लगती है ख़ारों की तरह ॥


चोट करती हैं तेरी यादों कि लहरें रात दिन,

टूटता रहता हूँ दरिया के किनारों की तरह॥


हो रही बरसात मुझपे रौशनी की आजकल,

आप आए ज़िंदगी मे चाँद-तारों की तरह॥   


खिल गईं है सारी कलियाँ मुस्कराया ये चमन ,

जब से आयें हैं वो गुलशन मे बहारों की तरह॥


वो तुझे कुछ भी कहे “सूरज”, मगर मेरे लिए,

है तेरा एहसास सावन की फुहारों की तरह॥

   
                                डॉ॰ सूर्या बाली “ सूरज”

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