डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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कैंडल


ज़िन्दगी का वीरान दामन
बहुत ही तन्हा, नाउम्मीद और बेरंग था।
फिर आयी एक उम्मीद की कैंडल
फिर आयी एक उम्मीद की किरण
मेरे ख्वाबों में मेरे ख्यालों में
मेरे एहसासों की पगडंडियों से गुजरती हुई
मेरे तनहा दिल के आंगन में उतर गई।
उस कैंडल की मद्धम रोशनी से रौशन हो उठा
मेरे दिल का कोना कोना।
कहने को तो मैं खुद सूरज था लेकिन
हर तरफ फैला था घुप्प अंधेरा
ऐसे में एक प्यारी सी मासूम सी छोटी सी कैंडल ने
घुप्प अंधेरे को छू मंतर कर दिया
और दिल के अंधेरे कमरे को
अपनी रौशनी से पल भर में भर दिया।
वो अरमानों के आंगन में रातरानी की खुशबू सी बिखर गई
और किसी जन्नत की हूर सी आंखों में उतरती गई ।
मैं उस प्यारी सी परी के ख्वाबों ख्यालों में खो गया।
उसके आने से जिंदगी में एक अजब सी खुशबू,
एक अजब सी खुशी, एक अजब सा अहसास बिखर गया।
चारों तरफ फूल ही फूल खिलने लगे
हर तरफ़ कलियां ही कलियां चटकने लगीं
उसके आने से लगा जिंदगी का एक अधूरा चैप्टर पूरा हो गया ।
मैं उसकी जुल्फों की घनी अमराईयों में ऐसा खोया
कि होश भी न रहा कि मैं कौन हूं?
सच ही तो है अपने को भूल जाना ही तो
सच्चा एहसास होता है प्यार का ।
थोड़े से ही वक़्त में उस छोटी सी कैंडल ने
इस सूरज की रोशनी को अपने आग़ोश में भर लिया।
अब एक एक पल उसके ही एहसास में बीतने लगे
जिंदगी मुझे वो सौगात दे गई जिसकी वर्षों  से तलाश थी।
आवारा दिल उसके खूबसूरत एहसास की वादियों में घूमने लगा।
रोज उसके एहसास से दिल के तार बजने लगे
रोज उसकी सलोनी सूरत ख्यालों में आने लगी
दिन हो या रात हो चारों तरफ बस उसी की
मुस्कुराहट बिखरी हुई नज़र आने लगी
हर तरफ उसकी ही शोख़ चंचल अदाएं
दिल में तूफान उठा रही थीं।
ऐसी ही थी वो कैंडल जो घुप्प अंधेरे को
पल भर में उजाले में तब्दील कर देती थी
हरसू उसी की सूरत हवाओं में, बादलों में
घटाओं में छाई हुई नजर आती थी ।
सब कुछ तो वही है
लेकिन अगर कुछ नहीं है तो वो कैंडल-
जो देती थी मुझे सुकून
जो दिखाती थी खूबसूरत ख़्वाब।
उसकी हर एक अदा उसका हर एक अंदाज़ कयामत था
उसका रूप जैसे फूलों पर शबनम की बूंद की तरह था
उसकी आवाज का जादू कोयल की कूक को कहीं पीछे छोड़ देता था
उसके चेहरे की रौनक़ हजारों तितलियों के रंगों को फीका कर देती थी
उसकी मुस्कुराहट लाखों कलियों को शर्मिंदा करती थी
फूलों से लदी डाली से कम न था उसका अंदाज़
उसके चेहरे का नूर किसी चांद से कम न था।
आखिर कैंडल तो कैंडल ही होती है ना
उसका भी सफ़र छोटा था
उसे ख़त्म होना था उसे जल जाना था और बुझ जाना था
और अपने पीछे छोड़ जाना था एक धुऐं की लकीर।
आख़िर वो जलती भी कब तक ?
लेकिन जितनी भी देर जली है अपने होने का एहसास कराती रही
और फिर खो गयी अपने चाहने वाले को छोड़ कर
फिर से उसी घुप्प अंधेरे में ।
कैंडल की जली हुई बाती और फर्श पर बिखरे मोम को देखता हूँ
और समेटता हूँ अपने जज़्बात के बिखरे हुए मोती
और फिर से खो जाता हूँ उसी घुप्प आँधियारे में !

डॉ. सूर्या बाली “सूरज”

बेतवा के किनारे

आज फिर ले आया है वक़्त उसी दर पे
जहां पे हमने उठाए थे मुहब्बत के पहले कदम 
भले ही गुज़रे हों कुछ साल कुछ महीने कुछ दिन रात
लेकिन आज भी तो लगता है 
जैसे वक़्त का पहिया वहीं थम सा गया हो
मातमी लिबास में आह और एहसास सिमट गए हो
भीगी पलकों में एक साथ हजारों ख़्वाब उभर आए हों 
यहीं से आगाज़ किया था हमने एक भरोसे का 
एक मख़मली एहसास का एक रिश्ते का
एक पागलपन का एक जुनून का एक उम्मीद का.....

सब कुछ तो वही है सिर्फ तुम नहीं हो
हाँ मगर बिखरी है तुम्हारी हजारों यादों की महक
यहाँ की खूबसूरत फ़जाओं में
मुहब्बतों के शहर में आवारा है तन्हा है बेमकां है दिल
और समेटे हैं तुम्हारी यादों के कारवां

बेतवा नदी की गुदगुदाती अल्हड़ धार
ओरछा के मंदिर महल और छतरियाँ 
नदी मे लटके हुए पेड़ों की टहनियाँ
सँकरे पुल से गुजरती हुई गाडियाँ और मुसाफ़िर
सब कुछ तो वही है
फिर क्यूँ लगता है कि फ़जाओं से कुछ ग़ायब है
क्यूँ लग रहा है कुछ अधूरापन ..

नदी के किनारे पेड़ की लटकती टहनियाँ
आज भी वैसे नदी की धार से अठकेलियाँ कर रही हैं 
लेकिन वो कशिश वो प्यार का एहसास 
न जाने कहाँ खो गया है...

वो पत्थर जिसपे कभी बैठ के 
कभी हमने की थीं ढेर सारी बातें
आज बहुत तन्हा और उदास सा है 
जैसे मुझसे पूछ रहा हो की 
तुम कहाँ हो? क्यूँ नहीं आई इस बार मेरे साथ?

तेरी यादों के हजारों बादल दिल पे बरस के गुजर गए 
लेकिन फिर भी कुछ आज भी जल रहा है...
सोगवार है दिल का चमन की हर कली हर फूल 
हैरान से हैं अपनी मुहब्बत के गवाह 
ये पुराने मंदिर महल और बेतवा की वादियाँ 
अगर कुछ बचा है तो एक उदासी एक सन्नाटा एक खालीपन

याद आता है पुराने महल के गुंबद मे तुम्हारा अलाप भरना
याद आती हैं तुम्हारी आवाज़ में मेरा आवाज मिलाना 
याद आता है साथ साथ प्यार के नगमें गुनगुनाना 
याद आ रहे हैं वो हंसी और ठहाकों के दौर 
आज भी जैसे दीवारें तुम्हारी आवाज़ सुनने को बेक़रार हैं 
आज भी मुंतज़िर है महल के गुंबद कमरे और अटारियाँ 
तुम्हारी एक झलक पाने को

आया था फिर से तुम्हारी यादों को समेटने 
लेकिन ये क्या मैं तो सब कुछ खो बैठा
अब कुछ भी तो नहीं रहा अपना
न वो नदी न वो घाट न वो पत्थर न वो बहती धार 
आज लगा मैं खुद भी तो नहीं रहा पहले सा.....
कुछ टूटा है कुछ छूटा है इस बेतवा के किनारे 
जहां मिली थी मुझसे मेरी मंज़िल 
जहां पूरी हुई थी मेरी तलाश 
काश ये तलाश जारी रहती ! काश मुझे मंज़िल न मिलती !
तो शायद आज भी मैं बहता रहता इस बेतवा की तरह 
और चलता रहा मुसल्सल एक मंज़िल की तरफ 
एक नूरानी उम्मीद और मखमली एहसास के साथ

डॉ॰ सूर्या बाली 'सूरज"