डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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बेतवा के किनारे

आज फिर ले आया है वक़्त उसी दर पे
जहां पे हमने उठाए थे मुहब्बत के पहले कदम 
भले ही गुज़रे हों कुछ साल कुछ महीने कुछ दिन रात
लेकिन आज भी तो लगता है 
जैसे वक़्त का पहिया वहीं थम सा गया हो
मातमी लिबास में आह और एहसास सिमट गए हो
भीगी पलकों में एक साथ हजारों ख़्वाब उभर आए हों 
यहीं से आगाज़ किया था हमने एक भरोसे का 
एक मख़मली एहसास का एक रिश्ते का
एक पागलपन का एक जुनून का एक उम्मीद का.....

सब कुछ तो वही है सिर्फ तुम नहीं हो
हाँ मगर बिखरी है तुम्हारी हजारों यादों की महक
यहाँ की खूबसूरत फ़जाओं में
मुहब्बतों के शहर में आवारा है तन्हा है बेमकां है दिल
और समेटे हैं तुम्हारी यादों के कारवां

बेतवा नदी की गुदगुदाती अल्हड़ धार
ओरछा के मंदिर महल और छतरियाँ 
नदी मे लटके हुए पेड़ों की टहनियाँ
सँकरे पुल से गुजरती हुई गाडियाँ और मुसाफ़िर
सब कुछ तो वही है
फिर क्यूँ लगता है कि फ़जाओं से कुछ ग़ायब है
क्यूँ लग रहा है कुछ अधूरापन ..

नदी के किनारे पेड़ की लटकती टहनियाँ
आज भी वैसे नदी की धार से अठकेलियाँ कर रही हैं 
लेकिन वो कशिश वो प्यार का एहसास 
न जाने कहाँ खो गया है...

वो पत्थर जिसपे कभी बैठ के 
कभी हमने की थीं ढेर सारी बातें
आज बहुत तन्हा और उदास सा है 
जैसे मुझसे पूछ रहा हो की 
तुम कहाँ हो? क्यूँ नहीं आई इस बार मेरे साथ?

तेरी यादों के हजारों बादल दिल पे बरस के गुजर गए 
लेकिन फिर भी कुछ आज भी जल रहा है...
सोगवार है दिल का चमन की हर कली हर फूल 
हैरान से हैं अपनी मुहब्बत के गवाह 
ये पुराने मंदिर महल और बेतवा की वादियाँ 
अगर कुछ बचा है तो एक उदासी एक सन्नाटा एक खालीपन

याद आता है पुराने महल के गुंबद मे तुम्हारा अलाप भरना
याद आती हैं तुम्हारी आवाज़ में मेरा आवाज मिलाना 
याद आता है साथ साथ प्यार के नगमें गुनगुनाना 
याद आ रहे हैं वो हंसी और ठहाकों के दौर 
आज भी जैसे दीवारें तुम्हारी आवाज़ सुनने को बेक़रार हैं 
आज भी मुंतज़िर है महल के गुंबद कमरे और अटारियाँ 
तुम्हारी एक झलक पाने को

आया था फिर से तुम्हारी यादों को समेटने 
लेकिन ये क्या मैं तो सब कुछ खो बैठा
अब कुछ भी तो नहीं रहा अपना
न वो नदी न वो घाट न वो पत्थर न वो बहती धार 
आज लगा मैं खुद भी तो नहीं रहा पहले सा.....
कुछ टूटा है कुछ छूटा है इस बेतवा के किनारे 
जहां मिली थी मुझसे मेरी मंज़िल 
जहां पूरी हुई थी मेरी तलाश 
काश ये तलाश जारी रहती ! काश मुझे मंज़िल न मिलती !
तो शायद आज भी मैं बहता रहता इस बेतवा की तरह 
और चलता रहा मुसल्सल एक मंज़िल की तरफ 
एक नूरानी उम्मीद और मखमली एहसास के साथ

डॉ॰ सूर्या बाली 'सूरज"