डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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आज का शेर

बुलंदी पर पहुंचना चाहता हूँ मैं भी लेकिन,

ग़लत राहों से पहुंचूँ इतनी भी जल्दी नहीं है॥

दौरे मुश्किल में कभी हार न हिम्मत “सूरज”,

ग़म के तूफान बहुत देर नहीं रहते हैं॥

बुलंदी पर पहुंचना खेल किस्मत का भी है लेकिन

बुलंदी पर टिके रहना फ़क़त मेहनत से आता है

डॉ सूर्या बाली 'सूरज'

15.06.2014

 

रूह को जिस्म से जुदा कर दे 

ख़त्म साँसों का सिलसिला कर दे 

भूल जाऊँ मैं उसकी यादों को

ये ख़ुदा कोई हादसा कर दे

डॉ सूर्या बाली ‘सूरज’

दग़ा मक्कारी धोका झूठ तेरी बेवफ़ाई

समझता है मेरा दिल भी कोई बच्चा नहीं है

 

14.08.2013

 

संभल कर फेंकना यादों के पत्थर दिल की दरिया में,

तलातुम दिल में उठठेगा छलक जाएंगी आँखें॥

डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

 

हो गयी रौशन मेरे ग़म की अंधेरी रात भी,

जब ख़यालों में तेरी यादों के जुगनू आ गए॥

डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

 

मतलब से आया बात किया हँस के चल दिया,

तू उसकी दिल्लगी को मुहब्बत न मान ले॥

डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

 

वो झूठ बोल के रिश्ते बचा रहा था बहुत,

मगर वो भूल गया झूठ छुप नहीं सकता॥

डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

 

पूछते फिरते हो दुनिया से ठिकाने का पता,

क्या कभी ख़ुद से भी पूछा से है कि जाना है कहाँ?

डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

 

झूठ का पत्थर लगा क्या दोस्तों,

बंट गया टुकड़ों में दिल का आईना॥

डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

 

मशरूफ़ियत में छूटी है रिश्तों की डोर भी,

माँ बाप से मिले हुए अरसा गुजर गया॥

डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

 

जो एक बार हुआ बेवफ़ा किसी के लिए,

कभी वो तेरे लिए बावफ़ा नहीं होगा॥

डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

 

वो बात बात पे खाने लगा क़सम जब से,

किसी भी बात पे अब तो यकीं नहीं होता॥

डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

 

14.03.2013

चमन में अब बहार आने के दिन हैं॥
गुलों में रंग भर जाने के दिन हैं॥
अभी से सर पे क्यूँ बोझा लिए हो,
तुम्हारे खेलने खाने के दिन हैं॥
डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

   

फ़रेबों की लगी दुकान है दुनिया के मेले में।

फँसे हैं लोग कैसे लेने देने के झमेले में॥

जहाँ पर हों हँसीं यादें तुम्हारी कारवां बन के,

भला रह सकता है कोई वहाँ कैसे अकेले में !!

                  डॉ॰ सूर्य बाली "सूरज”

बादे-सबा के झोंके सा आकर चला गया। 

आँखों से कोई नींद चुराकर चला गया॥

मैं देखता ही रह गया इक ख़ाब सा उसे,

वो ज़िंदगी को ख़ाब बनाकर चला गया॥

                  डॉ. सूर्या बाली “सूरज”


 

26.11.2012

 

नाजो अंदाज़ से वो पास से आकर निकला।

और हौले से मेरा हाथ दबाकर निकला॥

कर गया एक ही पल में वो दीवाना मुझको,

शोख़ नज़रों से वो जब तीर चलाकर निकला॥

                  डॉ. सूर्या बाली “सूरज”

वरक़ पे आने को बेताब हो रहा है अब,

रहेगा हाशिये पे आम आदमी कब तक॥

  डॉ. सूर्या बाली “सूरज”

10.12.2012

हर शाख मचलती है हर फूल महकता है,

जब भी कभी गुलशन में चर्चा तेरा होता है॥

                  डॉ. सूर्या बाली “सूरज”

मैं वो दाना हूँ शजर बन के कभी निकलूँगा, 

रख नहीं पाएगा तू ख़ाक मे दबा के मुझे॥

डॉ. सूर्या बाली “सूरज”