डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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आज की रचना

विश्व क्षय रोग दिवस पर विशेष टीबी गीत

March 24, 2012 at 18:09

रोग है टीबी संक्रामक, क्षयरोग तपेदिक इसके नाम।

फैलाता जीवाणु इसे माइक्रोबैक्टेरियम जिसका नाम ॥

यह बीमारी मुख्य रूप से फेफड़ों को खा जाती है।

हड्डी, चमड़ी, जोड़ों आंतों को भी ग्रास बनाती है॥

खाँसी छींक से थूक की बूंदे जो रोगी से आती हैं।

अच्छे भले इंसां को भी टीबी का रोग दिलाती हैं॥

भीड़ भाड़, गंदगी, गरीबी और कुपोषण जहां रहेगा।

वहीं पे टीबी ज़्यादा होगी घुट घुट के इंसान मरेगा॥  

चलो बचाएं सबको इससे कर दें इसका कत्ले आम।

रोग है टीबी संक्रामक, क्षयरोग तपेदिक इसके नाम॥1॥

भारत जैसे देशों की टीबी विकराल समस्या है।

इससे बचना और बचाना अब तो एक तपस्या है॥

एड्स के आ जाने से टीबी की औक़ात बढ़ी है।

साथ है चोली दामन का दोनों में खूब छनी है॥

चार व्यक्ति भारत मे प्रति मिनट संक्रमित होते है।

रुग्णावस्था में जा करके अपना जीवन खोते हैं॥

एक मिनट में एक व्यक्ति का कर देती है काम तमाम।

रोग है टीबी संक्रामक, क्षयरोग तपेदिक इसके नाम॥12॥

लाइलाज़ ये रोग नहीं इससे बिलकुल न घबराएँ।

लक्षण इसके दिखते ही फ़ौरन डाक्टर को दिखलाएँ॥

तीन हफ़्ते से ज़्यादा यदि रोगी को खाँसी आती है।

लगातार हल्का बुख़ार हो और भूंख मर जाती है॥

बलगम में जब दिखे खून और सीने में दर्द सताए॥

वज़न घटे  जब लगातार टीबी  के लक्षण बतलाए।

जांच करा लें  बलगम की वरना बुरा होगा अंजाम ।

रोग है टीबी संक्रामक, क्षयरोग तपेदिक इसके नाम॥3॥

राष्ट्रीय क्षय रोग नियंत्रण कार्यक्रम को सफल बनाएँ।

स्वास्थ्य केंद्र पे जा करके टीबी का उपचार कराएँ॥

इन केन्द्रों पे क्षय रोगी की मुफ्त जांच की जाती है।

रोग अगर होता है तो टीबी की दवा दी जाती है॥

लगातार जब पूर्ण अवधि तक ए.टी.टी. को खाएँगे।

                            टीबी से मुक्ति पा करके जीवन स्वस्थ बनायेंगे॥

मुक्ति मिलेगी टीबी से तो तन मन को होगा आराम ॥

रोग है टीबी संक्रामक, क्षयरोग तपेदिक इसके नाम॥

इधर उधर न थूंके केवल थूकदान प्रयोग मे लाएँ।

ध्यान रहे की थूकदान में ब्लीचिंग पाउडर अवश्य मिलाएँ॥

अगर छींक खाँसी आए तो मुंह पर इक रूमाल लगाएँ।

टीबी का उपचार कराके स्वयं  बचें औरों को बचाएँ।

सही समय पे अगर आप उपचार नहीं करवायेंगे।

पक्का है क्षय रोग के द्वारा इक दिन मारे जाएंगे॥

टीबी है घातक बीमारी बचना इससे सुबहो-शाम।

रोग है टीबी संक्रामक, क्षयरोग तपेदिक इसके नाम॥4॥

बीसीजी का एक टीका क्षय रोग से बहुत बचाता है।

तुरंत जन्म के बाद या 6 हफ़्ते में लगाया जाता है॥

स्वास्थ्य केंद्रों पे जाकर के मुफ्त में ये टीका लगवाएँ।

क्षय रोग से भारत की भावी पीढ़ी को आप बचाएं॥

मिलजुल के 24 मार्च को विश्व क्षय रोग दिवस मनाएँ।

टीबी के नियंत्रण में भारत सरकार का हाथ बटाएँ॥

जनहित, देश-समाज के हित में मिलकर आओ करें ये काम।

रोग है टीबी संक्रामक, क्षयरोग तपेदिक इसके नाम॥5॥

                                                  डॉ. सूर्या बाली “सूरज”

परिवार नियोजन और शादी की सही उम्र

December 15, 2011 at 00:07

शादी से शुरुआत है होती, एक नए परिवार की।

रचना करते मिलकर दो दिल, एक नए संसार की॥

सही उम्र मे लड़का-लड़की यदि करते विवाह हैं।

तब शादी सुखमय जीवन, उज्ज्वल भविष्य की राह है॥

लड़की की शादी तब करना, जब हो अठरह साल की।

इससे पहले राह न पकड़े, वो अपने ससुराल की॥

सही उम्र लड़के की शादी की, इक्कीस के बाद है।

इससे पहले शादी करना, क़ानूनन अपराध है॥

सही उम्र मे शादी से, फ़ायदा होता हर बात का।

अवसर मिलता शारीरिक एवं मानसिक विकास का॥

पढ़ लिखके आत्म निर्भर हो, समझे अपने अधिकार को।

छोड़े रूढ़िवादी रस्मों को, अपनाएं नए विचार को॥

शादी के उपरांत रखेँ, सीमित अपने परिवार को।

वैवाहिक जीवन का मज़ा लें, जाने इस संसार को॥

गर्भ निरोधक अपना के, बच्चा टालें कुछ साल तक।

समय रहते यदि न चेते तो, पछतायेंगे सौ साल तक॥

माँ बनने की सही उम्र भी बीस साल के बाद हो।

जिससे जीवन सुखमय हो जच्चा बच्चा आबाद हों॥

बच्चे की तब सोचें, जब पति पत्नी जिम्मेदार हों।

शिशु के लालन पालन को, दोनों ही तैयार हों॥

दो बच्चों के बीच फ़ासला, कम से कम तीन साल हो।

जिससे शिशु और माँ, दोनों ही खुशहाल हों॥

एक ही या दो बच्चे सोचें, अपनाएँ परिवार नियोजन को।

जिससे बच्चों को दे पाये,अच्छे कपड़े, घर, भोजन को॥

बढ़ती जनसंख्या को रोकें, बचाएं हिंदुस्तान को।

रोटी, कपड़ा, मकां मिल सके, जिससे हर इंसान को॥

सही उम्र मे शादी करके, अपना फ़र्ज़ निभाएँ आप।

औरों को भी शादी की, सही उम्र बतलाएँ आप॥

                                                              डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

विश्व एड्स दिवस पर विशेष-कविता

December 1, 2011 at 00:18

रोग तो अनेक प्रकार के हैं मानव में,

उनमे से एड्स की समस्या विकराल है।

सुलझी न गुत्थी इस रोग के इलाज़ की,

डॉक्टर और वैद्य सब इससे बेहाल हैं।।

                                   एक्वायर्ड इम्मुनो डिफीसियंसी सिंड्रोम नाम,

                                   आरएनए विषाणुजनित रोग की मिशाल है।

                                    एचआईवी विषाणु पैदा करता है एड्स को,

                                    रोक सके कौन इसे किसकी मजाल है।।

दूध, लार, मेरुद्रव्य में निवास करता है,

रक्त, वीर्य, योनिरस में तो मालामाल है।

करे मित्रता ये  सीडी-4 रक्त कणिका से,

पंगु प्रतिरक्षा करे ऐसी इसकी चाल है।।

                                  जब घट जाए प्रतिरोधक शक्ति तन की तो,

                                  कोई भी रोग कर सके बुरा हाल है।

                                  कहने को हमने तो चांद को भी जीत लिया,

                                  खोजे कैसे एड्स का इलाज़ ये सवाल है?

स्त्री, पुरुष, वर्ग, जाति-धर्म कोई हो,

करता न भेद भाव यही तो कमाल है।

सभी सूई, वैक्सीन, टबलेट बेकार हुए,

कोई भी दावा न तोड़ सकी इसका जाल है।।

                                 जांच करवा के ही खून चढ़वाइएगा,

                                 लगे नई सुई सिरिंज रखना ख्याल है।

                                 किसी अंजाने से संबंध जो बनाइये तो,

                                 उम्दा निरोध का ही करना इस्तेमाल है।।

रोग लाईलाज न तो टीका न दवाई है,

करिए बचाव एकमात्र यही ढाल है।

रोग लाईलाज न तो टीका न दवाई है,

करिए बचाव एकमात्र यही ढाल है॥

                                                                  डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

                                                             

किसी से प्यार करने का कोई मौसम नहीं होता

November 24, 2011 at 19:41

किसी से प्यार करने का कोई मौसम नहीं होता।

इरादा नेक हो तो दिल कभी बरहम1 नहीं होता॥


तुम्हारी बेवफ़ाई का अगर मौसम नहीं होता॥

तो ज़ालिम आज मेरा नोक-ए-मिज़्गाँ2 नम नहीं होता॥


तुम्हारी याद ने दिल को मेरे आबाद3 रखा है॥

मेरी दुनिया मे अब तनहाई का आलम4 नहीं होता॥


मोहब्बत ज़ख्म दे दे कर जिगर को चाक5 करती है,

ये ऐसा दर्द है जिसका कोई मरहम नहीं होता॥


अमीर-ए-शहर6 की दुनिया हो, या दुनिया हो ग़रीबों की,

मोहब्बत का ये पैमाना ज़ियादा कम नहीं होता॥


दरिंदों को अगर होता ज़रा भी प्यार इंसाँ से,

तो खुशियों के शहर मे मौत का मातम नहीं होता॥


कभी न चूमती मंज़िल कदम, बढ़कर के राहों मे,

अगर ख़ुद पे भरोसा, बाज़ुओं मे दम नहीं होता॥


अगर वो बेवफ़ाई मुझसे न करता कभी “सूरज”,

तो उसके प्यार मे खुश रहता रंजो-ग़म7 नहीं होता॥


                                      डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

 

1॰= बरहम=बेचैन  2. नोक-ए-मिज़्गाँ =पलकों के कोना   3.=आबाद= खुशहाल, सम्पन्न   4.आलम=स्थिति    5. चाक =चीर देना, फाड़ देना     6. अमीरे शहर= नगर का धनी आदमी     7. रंजो-ग़म= दुख-दर्द

 

कापर-टी: एक गर्भ निरोधक साधन

November 21, 2011 at 09:28

कापर-टी एक अस्थायी गर्भ निरोधक साधन है।

अवांछित गर्भ रोकना, इसका मात्र प्रयोजन है॥

तीन साल का अंतराल यदि बच्चों मे रखना चाहें।

मुफ़्त मे, स्वास्थ्य केंद्र पर जाकर कापर-टी लगवा लें॥


अंतराल यदि बच्चों मे रखेगें तो बेहतर होगा॥

अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य उनके लिए हितकर होगा॥

बच्चेदानी  के भीतर यदि कापर-टी लगा दी जाती है।

जब बच्चे की चाहत हो, आसानी से हटा दी जाती है॥


डिंब और शुक्राणु को ये मिलने से रोक देती है।

एक भरोसे मंद उपाय जो बहुत सुरक्षा देती है॥

प्रशव के छः हफ़्ते बाद, या गर्भ समापन जब करवाएँ।

या मासिक धर्म के तुरंत बाद मे कापर-टी लगवाएँ॥


कुछ महिलाओं को कापर-टी थोड़ा कष्ट दे सकती है।

अधिक माहवारी या पेंड़ू मे पीड़ा कर सकती है॥

कुछ ही दिन मे ये दिक्कत स्वतः दूर हो जाती है।

डॉक्टर से संपर्क करें यदि दिक्कत ज़्यादा आती है॥


पहला बच्चा होने के बाद ही कापर-टी लगवाएँ॥

तीन साल तक मस्त रहे और गर्भ से छुट्टी पाएँ॥

साफ हाथ से बीच बीच मे धागे का अनुभव किया करें॥

संक्रामण न होने पाये इस बात का ध्यान भी दिया करें॥


योनि मे कोई संक्रामण हो या अनियमित माहवारी हो।

पेट मे बच्चा पलटा हो या एनीमिया की बीमारी हो॥

बच्चे दानी मे यदि सूजन, कैंसर, ट्यूमर हो जाएँ ।

ऐसी स्थितियों मे कभी भी कापर-टी न लगवाएँ॥


कापर-टी विश्वसनीय तरीक़ा, हँसी ख़ुशी अपनाएं।

वैवाहिक जीवन का सुख ले, अनचाहे गर्भ से छुट्टी पाएँ॥

बातें “सूरज” की मानें, बस दो ही फूल खिलाएँ ॥

बढ़ती जनसंख्या को कम करें, कापर-टी लगवाएँ॥


                                             डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

किसी से प्यार उसको भी जो हो जाता मज़ा आता

November 15, 2011 at 03:56

किसी से प्यार गर उसको भी हो जाता मज़ा आता॥

मोहब्बत मे कोई उसको भी तड़पाता मज़ा आता॥


समा भी खूबसूरत है, बड़ी मुद्दत से प्यासा हूँ,

अगर इक जाम साक़ी प्यार से लाता मज़ा आता॥


वो बादल बन के आया था हमारी ज़िंदगानी में,

अगर खुलके मिरी छत पे बरस जाता मज़ा आता॥


गुज़ारी तुमने काफी उम्र अपनी बेवफ़ाओं में,

वफ़ादारों से गर तू जोड़ता नाता मज़ा आता॥

 

इशारे ही इशारे मे वो दिल की बात कहता है,

कभी मेरे इशारे भी समझ पाता मज़ा आता॥

 

सुहानी शाम है दिलकश फिज़ा रंगीन मौसम है,

अगर वो आज फिर कोई ग़ज़ल गाता मज़ा आता॥


ज़माने की अदावत का सबब है दोस्ती अपनी,

हमारा प्यार उनको भी अगर भाता मज़ा आता॥


ख़ुदा मिलता नहीं है बंदगी से मान ले “सूरज”

अगर तू बनके आशिक़ जोड़ता नाता मज़ा आता॥


                                 डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

अदब से चिलमन उठा रही थी।

November 12, 2011 at 01:39

अदब से चिलमन उठा रही थी।

दिलों पे बिजली गिरा रही थी॥


            बना रही थी सभी को बिस्मिल,

            वो जब भी नज़रें घुमा रही थी॥


शबाब उसका उरूज़ पे था,

गज़ब क़यामत वो ढा रही थी॥


            गुलों की सुर्ख़ी लबों पे उसके,

            गुलों सा ही मुस्करा रही थी॥


सलाम करने की इक अदा थी,

निगाह जब वो झुका रही थी॥


            हसीन आँखों के मस्त प्याले,

            नज़र से मय वो पिला रही थी॥


भला ये “सूरज” न आता कैसे,

हसीं सुबह जब बुला रही थी॥


                              डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

घूमता हूँ मै अकेला ग़म के मारों की तरह

October 31, 2011 at 23:03

घूमता हूँ मै अकेला ग़म के मारों की तरह।

ज़िंदगी तेरे बिना लगती है ख़ारों की तरह ॥


चोट करती हैं तेरी यादों कि लहरें रात दिन,

टूटता रहता हूँ दरिया के किनारों की तरह॥


हो रही बरसात मुझपे रौशनी की आजकल,

आप आए ज़िंदगी मे चाँद-तारों की तरह॥   


खिल गईं है सारी कलियाँ मुस्कराया ये चमन ,

जब से आयें हैं वो गुलशन मे बहारों की तरह॥


वो तुझे कुछ भी कहे “सूरज”, मगर मेरे लिए,

है तेरा एहसास सावन की फुहारों की तरह॥

   
                                डॉ॰ सूर्या बाली “ सूरज”

साँचे मे अपने आप को ढलने नहीं देते

October 29, 2011 at 00:12

साँचे मे अपने आप को ढलने नहीं देते ।

दिल मोम का रखते हैं पिघलने नहीं देते॥


                   इक बार बना लेते हैं मेहमान जिसे हम,

                  खाना-ए-दिल से उसको निकलने नहीं देते॥


मौक़ा नहीं देते है बार बार किसी को,

दुश्मन को कभी गिरके सम्हलने नहीं देते॥


                 जो छीन ले चैन-ओ-अमन, आराम किसी का,

                 आँखों मे ऐसे ख़्वाब को पलने नहीं देते॥


कांटो से सज़ा रखे हैं ये राह-ए-ज़िंदगी,

फूलों की तरफ दिल को मचलने नहीं देते॥


                   रहते खड़े हर गाम रौशनी के साथ हम,

                  “सूरज” कभी उम्मीद का ढलने नहीं देते॥

                 

                                   डॉ। सूर्या बाली "सूरज"

दिल से नफ़रत को हटाकर देखो

October 25, 2011 at 01:49

दिल से नफ़रत को हटाकर देखो।

थाल पूजा के सजाकर देखो॥


आ गई नूर1 भरी दिवाली,

दीप खुशियों के जलाकर देखो॥


जश्न है, शोर है पटाखों का,

फूलझड़ियों को छुड़ाकर देखो॥


खूबसूरत लगेगी ये दुनिया,

तीरगी2 दिल की मिटाकर देखो॥


दो कदम बढ़ के भरो बाहों मे,

ज़िद की दीवार गिराकर देखो॥


साथ था कारवां कभी मेरे,

अब मैं तन्हा हूँ ये आकर देखो॥


फूल ही फूल नज़र आएंगे,

राह से खार3 हटाकर देखो॥


दिल को आराम मिलेगा तेरे,

रोते बच्चे को हँसाकर देखो॥


होके मदहोश सभी झूमेंगे,

जाम नज़रों से पिलाकर देखो॥


ये जहां साथ गुनगुनाएगा,

तुम ग़ज़ल मेरी तो गाकर देखो॥


दौड़ा “सूरज” भी चला आएगा,

दिल से इकबार बुलाकर देखो॥

 

                      डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

नूर1=उजाला,  तीरगी2=अंधेरा, खार3=कांटा

लोगों ज़रा इस देश के हालात देखिये

October 23, 2011 at 23:26

लोगों ज़रा इस देश के हालात देखिये।

लुटती हुई जनता को दिन-ओ-रात देखिये॥


बिकने को है तैयार ये रोटी के वास्ते,

महगाई मे ग़रीब कि औक़ात देखिये॥


मज़हब, हुनर, ईमान औ एहसास भी बिके,

बाज़ार मे बिकते हुए ज़ज़्बात देखिये॥


कल तक तो मेरे पास मे इक पैसा नहीं था,

अब हो रही है नोटों कि बरसात देखिये॥


तन्हा ये ज़िंदगी का सफर अब रहा नहीं

है साथ तेरी यादों कि बारात देखिये॥


                    डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

शाम ढलने लगी, चाँद दिखने लगा

October 4, 2011 at 00:05

शाम ढलने लगी, चाँद दिखने लगा,

                तेरी यादों का लश्कर निकलने लगा।

                             ऐसा छाया नशा कहकशां देखकर,

                                            टूट के दिल मेरा ये बिखरने लगा ॥

 

बज़्म मे लोग थे, फिर भी वीरान था,

            तुमसे मिलने का बस मेरा अरमान था।

                               ढूंढ के थक गयीं, जब निगाहें तुम्हें,

                                             दर्द बढने लगा, गम सँवरने लगा॥

 

झील सी आँखें थीं, आँखों मे था नशा,

                उस नशे में ही मदहोश था मयकदा।

                                वो पिलाते गए, हम भी पीते गए,

                                            और फिर जाम मेरा छलकने लगा।।

 

ईद के चाँद हो, चाँद जैसी हसीं,

              मैंने देखा नहीं तुझसा परदा नशीं।

                            आज बेपर्दा हो के, जो निकलें हो तुम,

                                           दिल मेरा आज फिर से मचलने लगा॥

 

तुमने वादा किया था की आओगे तुम,

             आके बाहों मे मेरी समाओगे तुम।

                              जब भी आहट हुई कोई दरवाजे पे,

                                                  ज़ोर से दिल मेरा ये धड़कने लगा।

 

                                                           डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

स्वच्छता संबंधी नारे एवं स्लोगन

October 2, 2011 at 16:36

दिन प्रतिदिन की स्वच्छता कितनी है अनमोल।

सुख, समृद्ध, विकास की देती रहें खोल ।।

                    अगर स्वच्छता पास रही तो रोग नहीं आएंगे।

                    तन निरोग, सुंदर होगा,जीवन खुशहाल बनाएँगे॥


साफ सफाई को यदि हम जीवन में अपनाएँगे।

कितना बड़ा बना देती है तभी समझ हम पाएंगे॥

                                  वस्त्रों को रखें सदा स्वच्छ और रोज़ नहाएँ।

                                  हाथों पैरों के कोई नाखून नहीं बढ्ने पाये॥


रोज़ शौच के बाद हाथ साबुन से धोएँ।

खाना खाने के उपरांत, ब्रश करके सोएँ॥

                                 थोड़ी सी यह साफ सफाई ज़्यादा काम करेगी।

                                  बचत करेगी पैसे की, डॉक्टर से दूर रखेगी॥


घर आँगन को स्वच्छ रखें, गंदगी हटाएँ।

वातावरण बनाएँ ऐसा, जो सबको ही भाये॥

                           तुरंत बनाएँ, ताज़ा खाएं, बासी न बचने पाये।

                           न हो भोजन की बर्बादी, न ही कोई रोग सताये॥

(पूरी रचना मेडिकल कवितायें सेक्शन मे पढ़ी जा सकती है)

                                                                                  डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

दहेज अभिशाप है

September 30, 2011 at 17:07

किसी ने पूछा:

दहेज अभिशाप है या वरदान?

थोड़ा सा सोचा समझा, फिर बोला-

इसमे मिलता है दान, इसलिए हो सकता है वरदान।

उन्होने झट कहा नहीं भाई ऐसा नहीं ,

दहेज अभिशाप है, वरदान नहीं॥

तुरंत ध्यान आया, ये तो दहेज मे बड़े आगे थे,

अपने ही लड़के की शादी मे,

कैश, कार और कलर टीवी मांगे थे।

जो चिल्लाते हैं दहेज लेना पाप है,

यदि वही सम्हल जाएँ।

तो शायद दहेज उन्मूलन आसानी से हो जाये।

यह एक सामाजिक बुराई है।

इस पे सरकारी नियम काम नहीं करेंगे।

यह हमारा कर्तव्य है-इसे हम दूर करेंगे।

सावधान  युवकों !

यह एक सभ्य समाज बनाने की चुनौती है।

जलती महिलाओं को बचाने की चुनौती है।

अगर अभिशाप के कलंक को मिटाना है।

दहेज को सचमुच वरदान बनाना है।

तो बिना दहेज की ही दुल्हन घर मे लाना है!!

                        डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

भ्रष्टाचारी महोदय

September 29, 2011 at 21:49

जलते हुए मकान, जलते हुए इंसान,

क्या किसी ने देखा।

ऑफिस, बाज़ार, अस्पताल, स्कूल और

जाने कहाँ कहाँ फैला हुआ भ्रष्टाचार,

क्या किसी ने देखा?

भ्रष्टाचार कहीं भी आसानी से देखने को मिल जाएगा,

क्या आप उसे देखना चाहेंगे?

देखिये ! खूब देखिये...

यह बिलकुल नहीं सरमाएगा।

निर्लज्ज है, पुराना है, कण कण मे समाया है,

भ्रष्टाचार को हम, आप या किसी और ने बनाया है?

क्या आप भ्रष्टाचारी है?

नहीं तो।

तो भ्रष्टाचार मे क्यूँ लिप्त हैं?

आप से मतलब, मैं लिप्त हूँ अपने काम में,

बैठा हूँ अपने मुकाम में,

आप कौन हैं? मेरे काम मे हस्तक्षेप करनेवाले?’

फ़र्जी हिदायत देने वाले,

क्या आपको पता नहीं भ्रष्टाचार ही मेरा व्यापार है,

यही मेरा यार है, यही मेरी सरकार है।

हाँ....मैं भ्रष्टाचारी हूँ, भ्रष्टाचारी हूँ।

क्या आपको इससे कोई सरोकार है।

आप यहाँ से जाइए, अपना काम करिए।

इसको आप क्या करेंगे ये तो,

भ्रष्टाचार है, भ्रष्टाचार है, भ्रष्टाचार है...

                  डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

पल्स पोलियो का अभियान

September 28, 2011 at 01:17

सफल बनाओ सब मिल करके, पल्स पोलियो का अभियान।

पूर्ण करो इस महा यज्ञ को, दे करके योगदान महान।

            पोलियो का उन्मूलन करना, अब कर्तव्य हमारा है,

            अब हम सबने मिलकर के, इस पोलियो को ललकारा है।

देकर के वैकसीन बच्चों को, ये अभिशाप मिटाना है,

पल्स पोलियो प्रतिरक्षण अभियान को सफल बनाना है।

            पोलियो विषाणु जनित रोग, पैरों की शक्ति घटा देता है।

            बचपन मे यदि हो जाये, जीवन भर पंगु बना देता है।

दूषित भोजन पानी के जरिये मानव तक आता है,

घुसता है आहरनाल से , तंत्रिका तंत्र को खाता है।

            चढ़ता है बुखार तेज़ और अंग शिथिल पड़ जाते हैं,

            पक्षाघात हो जाता है, बच्चे लंगड़े हो जाते हैं।

कोई विशेष इलाज़ नहीं,बस मात्र बचाव तरीका है,

पूर्ण सुरक्षा के लिए केवल पोलियो का टीका है।

            पोलियो टीकाकरण को ख़ुद समझें औरों को बताएं,

            पाँच साल तक के बच्चो को, पोलियो ड्राप अवश्य पिलाएं।

इस टीके से बच्चों को कोई हानि नहीं होती है,

जो माँ ड्रॉप नहीं पिलवाती वो जीवन भर रोती हैं।

            “सूरज” पूरे जनमानस को, ये संदेश सुनाना है,

            अपने प्यारे भारत को, पोलियो से मुक्त कराना है।।

                                                              डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

परिवार नियोजन

September 27, 2011 at 19:55

निकल आया है क्षितिज पे सूर्य, लिए मानवता का संदेश।

जागो नर - नारी भारत के, बचा लो अपना सुंदर देश।।

                 समस्याएँ जन्मी बहु भांति, बढ़ी जनसंख्या अपरंपार।

                लगे घटने सब संसाधन, मगर बढ़ती ही गयी कतार ॥

चला दो ऐसा इक अभियान, मिले सबको,सबके अधिकार।

चाहते यदि रहना खुशहाल, करो छोटा अपना परिवार॥

               करो बस पैदा दो संतान, तीसरे की न करना भूल।

               चाहे लड़का हो या लड़की, खुशी से करना उसे क़बूल॥

सुरक्षित रखो बच्चों का स्वाथ्य, न पड़ने दो उनको बीमार।

बीसीजी, डीपीटी, पोलियो, खसरे का टीका दो  क्रमवार॥

               उचित शिक्षा का करो प्रबंध, उचित भोजन दो, उच्च विचार।

               करो लड़के- लड़की मे न भेद, दोनों को दो समान अधिकार॥

सोचना तब दूजे की बात, पहला जब जाने लगे स्कूल।

कम से कम तीन साल अंतराल, इससे पहले न करना भूल॥

              रुकेगा तन और मन का विकास, अगर लंबा होगा परिवार।

              लगाओ कापर- टी और लूप, बढ़ाओ धरती पे न भार॥

प्रयोग निरोध का करके तुम, रख सकोगे सीमित परिवार !

अपने सपनों की खुशियों को, कर सकोगे तब तुम साकार॥

                                                               डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज

ये तो माया है रब की, मै क्या कहूं

September 26, 2011 at 13:41

दुनिया के उल्टी रीति की यारों, आओ दिखाऊँ झलकी।

मै क्या कहूँ, ये तो माया है रब की, मै क्या कहूँ॥

गया पहाड़ पे, पत्थर का एक टुकड़ा ढूंढ के लाया।

ले कर छेनी और हथौड़ी, मूरत एक बनाया॥

मैं बेचारा भूंखा सोऊँ, मूरत चांपे बर्फी।

मै क्या कहूँ, ये तो माया है  रब की, मै क्या कहूँ॥

ईंटा गारा कर के हमने, मंदिर इक बनवाया।

बन चुन के तैयार हुआ तो, मै ही न घुस पाया॥

कहें अछूत है, घुसने न दे, ऐसी उनकी मर्जी।

मै क्या कहूँ, ये तो माया है  रब की, मै क्या कहूँ॥

जिसने सारी दुनिया बनाई, उसके लिए घर बनवाते है।

पत्थर पीते दूध, दही और बच्चे भूंखे सो जाते हैं।।

हद हो गयी है “सूरज” देखो इनके पागलपन की।

मै क्या कहूँ, ये तो माया है  रब की, मै क्या कहूँ॥

                                  डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

एक बहकी हुई अंगड़ाई की, आज रह रह के याद आती है

September 26, 2011 at 04:13

एक बहकी हुई अंगड़ाई की, आज रह रह के याद आती है।

अपनी बिछड़ी हुई परछाई की, आज रह रह के याद आती है।।

थे बहुत, वो न थे, चाहत थी जिनकी आँखों मे,

दरमियाँ बज़्म के तनहाई की, आज रह रह के याद आती है।

अपनी बिछड़ी हुई परछाई की, आज रह रह के याद आती है।।

गुजर गए, वो मेरे कूचे से, गैरों की तरह,

गूँज कानों में, उस सहनाई की, आज रह रह के याद आती है।

अपनी बिछड़ी हुई परछाई की, आज रह रह के याद आती है।।

वो शोखियाँ, वो अदाएं, वो चहकना उनका,

छोटी सी बात पे लड़ाई की, आज रह रह के याद आती है।

अपनी बिछड़ी हुई परछाई की, आज रह रह के याद आती है।।

हाले दिल अपना सुनाऊँ मैं तुम्हें क्या “सूरज”,

एक हसीना की बेवफ़ाई की, आज रह रह के याद आती है।

अपनी बिछड़ी हुई परछाई की, आज रह रह के याद आती है।।

                                                       डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

रात दिन जाने क्यूँ, करता हूँ बंदगी तेरी

September 25, 2011 at 19:48

रात दिन जाने क्यूँ, करता हूँ बंदगी तेरी।

ख़ुद की लगने लगी है, अब तो ज़िंदगी तेरी॥

                    इक मुलाक़ात हुई क्या, बदल गया आलम,

                    अजीब नूर भर लायी है दोस्ती तेरी॥

जब भी डसती है तनहाई की नागन मुझको,

बहुत ही याद सताती है अजनबी तेरी।

                  दिल दिया इश्क़ मे,चैन और सुकूं भी गया,

                  अब मेरी जान भी, ले लेगी दिल्लगी तेरी॥

नाम दिवानों मे एक दिन तेरा होगा ‘सूरज”,

रंग लाएगी एक दिन ये आशिक़ी तेरी।।

                     -डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

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