डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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तुम

तुम विरह की पीडा़ हो

या हो मिलन की मधुरता|

तुम प्रेम का उन्माद हो

या हो हृदय की आकुलता|

तुम जीवन की गति हो

या हो प्राणों का संचार|

तुम मात्र् आकर्षण हो

या हो मेरा पहला प्यार|

तुम मेरे जीवन की तपन हो

या हो शीतल मन्द बयार|

तुम इच्छाओं का सागर हो

या प्रेम की उन्मुक्त फुहार|

हो तुम कहीं निशीथ तो नहीं

या सचमुच 'सूर्य' मेरे जीवन के

तुम सच में मेरी सम्पूर्णता हो

या हो अपूर्ण स्वप्न मेरे मन के

तुम केवल क्षणिक हो,

या हो सदा से प्रिये|

आज ये मिलन है, क्या

कल स्मृति के लिये?

                -सावित्री राठौर

उसकी पहली नज़र ही असर कर गयी

उसकी पहली नज़र ही असर कर गयी ।           
एक पल में ही दिल में वो घर कर गयी ॥

हर गली कर गयी हर डगर कर गयी ।
मुझको रुसवा तेरी इक नज़र कर गयी ॥

मैंने देखा उसे देखता रह गया ,
मुझको खुद से ही वो बेखबर कर गयी ॥

साथ चलने का तो मुझसे वादा किया ,
वो तो तन्हा ही लेकिन सफ़र कर गयी॥

जिस घडी पड़ गयी इक नज़र यार की,
एक ज़र्रे को शम्सो कमर कर गयी ॥

हमने मांगी थी 'हसरत' जो रब से दुआ,
वो दुआ अब यक़ीनन असर कर गयी॥

शरीफ अहमद कादरी "हसरत"


तुम्हारे फूल से चेहरे की चाहत मार डालेगी

तुम्हारे फूल से चेहरे की चाहत मार डालेगी।

ये मुझको लगता है तेरी मोहब्बत मार डालेगी॥

तेरा चेहरा, तेरी आँखें, तेरा अंदाज़ क़ातिल है,

तुम्हारे फूल से होठों की रंगत मार डालेगी॥

तुम्हारे हिज्र मे अक्सर मेरा दिल मुझसे कहता है,

तुम्हारी बेवफ़ाई की ये आदत मार डालेगी॥

ये ऐसा दौर है, इस दौर में, मासूम इन्सा को,

वफ़ा,एखलाख, सच्चाई, शराफत मार डालेगी ॥

सियासी रहनुमाओं वक़्त है अच्छे बनो वरना

मुफ़लिसों, बेसहारों की बगावत मार डालेगी॥

मेरे दिल देख अब इस आशिक़ी बाज़ आ वरना,

तुझे ये तेरी आवारा तबीयत मार डालेगी॥

 वो कहता था कि मैखाने मे जाना छोड़ दे “सूफ़ी”,

वगरना साक़ी पैमाने की सोहबत मार डालेगी॥

                                   

                                          राकेश "सूफी"

रात भर फिर जगा रही है मुझे

रात भर फिर जगा रही है मुझे।

याद उसकी सता रही है मुझे ॥

दिल के दरवाज़े पे देकर दस्तक,

कोई लड़की बुला रही है मुझे॥

ये ज़रूरत भी क्या अजब शै है,

शहरों शहरों  फिरा रही है मुझे।

आपका साथ जबसे छूटा है,

दुनिया आंखे दिखा रही है मुझे॥

कुछ सियासत  ने खाया मेरा हक़,

कुछ ये महगाई खा रही है मुझे।

ज़िंदगी देखो आजकल "सूफ़ी",

मय के प्याले पिला रही है मुझे।

                   राकेश”सूफ़ी”

मेरी अर्ज़े तमन्ना पे सितमगर कुछ नहीं कहता

मेरी अर्ज़े तमन्ना पे सितमगर कुछ नहीं कहता।
गुज़र जाता है रास्ते से वो हँसकर कुछ नहीं कहता॥
हमारी ज़िंदगी का इस तरह बर्ताव है हमसे,
कि जैसे नाचनेवाली का शौहर कुछ नहीं कहता॥
किसी कि बेवफ़ाई ने मुझे पत्थर बना डाला,
उसे मैं कैसे समझाऊँ कि पत्थर कुछ नहीं कहता॥
बहक जाते हैं कैसे लोग बस दो चार क़तरों में,
यहाँ मैं पूरा मैख़ाना भी पीकर कुछ नहीं कहता,
बहादुर आदमी ही जंग का नक्शा बदलता है,
मियां तारीख शाहिद है कि कायर कुछ नहीं कहता॥
तू हरजाई है तू  है बेवफ़ा, फिर भी मैं तेरा हूँ,
ये दुनिया कह रही है तेरा “दिलबर” कुछ नहीं कहता॥
                        राकेश दूबे “सूफी”

वो मेरी आज थोड़ी सी बुराई करने वाला है

वो मेरी आज थोड़ी सी बुराई करने वाला है।
मेरा माशूक  मुझसे बेवफ़ाई करने वाला है॥
मेरे दिल के मदरसे में पढ़ाई करने वाला है,
वो काफ़िर आज काबे मे रसाई करने वाला है॥
हमें इन हिचकियों से इस तरह महसूस होता है,
तेरी यादों का लश्कर फिर चढ़ाई करने वाला है॥
न मैं युसुफ़ न औरंगज़ेब आलमगीर हूँ फिर भी,
दग़ा क्यूँ मुझसे आख़िर मेरा भाई करने वाला है॥
चलो ऐ दिल के बीमारों सुना है कोई चारागर,
मुहब्बत के मरीज़ो की दवाई करने वाला है।
ज़लालत, भीक का उसको निवाला पच नहीं सकता,
वो है मज़दूर मेहनत की कमाई करने वाला है॥
                 राकेश दूबे “सूफी”

उसके ग़म मे पलकें भिगोना ठीक नहीं

उसके ग़म मे पलकें भिगोना ठीक नहीं।
हरजाई के प्यार मे रोना ठीक नहीं॥
 अश्कों से क्यूँ गाल भिगोते रहते हो,
 फूलों को तेज़ाब से धोना ठीक नहीं॥
दुश्मन चाहे जितना ही ज़ालिम हो मगर,
कोई मुनाफ़िक़ दोस्त का होना ठीक नहीं॥
 उनपे जवानी आई उन्हे मालूम  नहीं,
 ऐसी उम्र मे खेल खिलौना ठीक नहीं॥
फूलों की बरसात जो हमपे करता है,
उसकी राह मे कांटे बोना ठीक नहीं॥
                             राकेश दूबे “सूफी”

रात को जब सारा जग सोता है...

द्वारा डॉ॰ अनिल रावत

रात को जब सारा जग सोता है, सड़कें सूनी होती हैं,

झींगुर की तीखी ध्वनि से सन्नाटा कुछ कम होता है,

घड़ी की धीमी टिक टिक भी पलसर का हॉर्न लगती है,

तब यादों के सुंदर सहर मे मित्रों का मजमा लगता है।

मित्रों का मजमा लगता है फिर बातें ढेरों होती हैं,

रातों को जब सन्नाटा होता है , तब उनसे मिलना होता है,

सबेरे तक समय के पहिये से, यादें कुचल दी जाती हैं,

पर यारों के बिना जीवन जीना बेमानी लगता है,

जीवन बेमानी लगता है...

मित्रों को ढेर सारा प्यार


 


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