डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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Blog posts : "General"

रस्म ए उलफ़त की बात करते हैं

July 18, 2016 at 16:26

रस्म ए उलफ़त की बात करते हैं

हम मुहब्बत की बात करते हैं

 

वहशते ग़म के साथ रहके भी

हम मसर्रत की बात करते हैं

 

जो इशारे हैं उनकी आँखों के

सब शरारत की बात करते हैं

 

ज़िक्र होता है वस्ल का जब भी

वो क़यामत की बात करते हैं

 

पूछता है जो कोई हाले दिल

उसकी रहमत की बात करते हैं

 

दिल में क्या है बयां नहीं करते

बस सियासत की बात करते हैं

 

क्यूँ डरें इश्क़ में ज़माने से

हम बग़ावत की बात करते हैं

 

जो लुटेरे थे क्या हुआ उनको

क्यूँ हिफ़ाज़त की बात करते हैं

 

जिनको इल्मे वज़ू नहीं 'सूरज'

वो इबादत की बात करते हैं

 

डॉ सूर्या बाली 'सूरज'

1. उलफ़त =प्रेम 2. वहशते ग़म= दुख का डर 3. मसर्रत= खुशी 4. वस्ल= मिलन

5. रहमत= कृपा 6. सियासत= राजनीति 7. हिफ़ाज़त= सुरक्षा

8. इल्मे वज़ू = नमाज़ से पहले पानी से खुद को साफ करने का ज्ञान 7. इबादत = पूजा

 

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दुनिया ने कहा इश्क़ में रुसवाई बहुत है

July 7, 2016 at 11:26

दुनिया ने कहा इश्क़ में रुसवाई1 बहुत है 

मुझको भी लगा बात में सच्चाई बहुत है

 

आई है मुझे कहने को वो ईद मुबारक

शायद वो इसी बात से घबराई बहुत है

 

देखेगी मगर ज़ख़्म को मरहम नहीं देगी 

ये भीड़ ज़माने की तमाशाई2 बहुत है

 

दुनिया को मैं नादान नज़र आता हूँ लेकिन 

माँ कहती है के मुझमें भी दानाई3 बहुत है

 

हमराज़4 मेरा तेरे सिवा कोई नहीं है 

कहने को ज़माने से शनासाई5 बहुत है

 

इक ताजमहल उसकी मुहब्बत में बना दूँ 

बनता ही नहीं क्या करूँ महँगाई बहुत है

 

तुम तीर न ख़ंजर न ये तलवार उठाओ 

करने के लिए क़त्ल ये अंगड़ाई बहुत है

 

मैं झील सी आँखों में कहीं डूब न जाऊँ

आँखों में तेरे प्यार की गहराई बहुत है

 

कहने को मेरे पास तो है सारा ज़माना 

इक तेरे बिना बज़्म5 में तन्हाई बहुत है

 

हर सुब्ह का अंजाम वही शाम सा ढलना

'सूरज' ने मुझे बात ये समझाई बहुत है

 

डॉ. सूर्या बाली 'सूरज'

1. रुसवाई = बदनामी 2. तमाशा देखने वाली 3. दानाई= समझदारी  4. हमराज़ = हर भेद जानने वाला, मित्र 5. शनासाई= जान पहचान 6. बज़्म =महफ़िल 

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बेवफ़ा सुन ले तुझे प्यार किया है मैंने

June 27, 2016 at 23:41

साहब ए इश्क़1 को अफ़गार2 किया है मैंने

बेवफ़ा सुन ले तुझे प्यार किया है मैंने

 

कोई सौदागर ए ग़म3 हो तो इसे ले जाये

दर्द ओ ग़म को सरे बाज़ार किया है मैंने

 

दिल की दहलीज़4 पे रख के तेरी यादों के चिराग

हर शब-ए-हिज़्र5 को गुलज़ार किया है मैंने

 

दर्द पिघले तो न बहने लगे आँखों से कहीं

दिल के ज़ख़्मों को ख़बरदार किया है मैंने

 

उसकी रुसवाई6 न हो बज़्म7 की ग़ैरत8 भी रहे

चश्म ए पुरनम9 से ही गुफ़्तार10 किया है मैंने

 

बोझ दिल पे लिए आया था वो मुझसे मिलने

ऐसे इक वस्ल11 से इंकार किया है मैंने

 

वो मेरा होगा तो आएगा लौट के, उसको

फैसले के लिए मुख़्तार12 किया है मैंने

 

टूटी कश्ती में मुहब्बत का सफ़र है 'सूरज'

चाहतों को तिरी पतवार किया है मैंने

 

डॉ सूर्या बाली 'सूरज'

 

1. साहब ए इश्क़ = दिल 2.अफ़गार= घायल 3. सौदागर ए ग़म = दुख का व्यापारी 4.दहलीज़ = चौखट 5. शब-ए-हिज़्र=वियोग की रात 6. रुसवाई= बदनामी 7. बज़्म= महफिल 8. ग़ैरत =स्वाभिमान 9.आंसुओं से भीगी आँखें 10. गुफ़्तार= बातचीत 11. वस्ल= मिलन 12. मुख़्तार = स्वतंत्र, आज़ाद

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उम्र गुज़रेगी कैसे तेरे बग़ैर

June 26, 2016 at 01:20

दे दिया दिल किसी को जाने बग़ैर 

जी न पाऊँ अब उसको देखे बग़ैर

 

वो ही धड़कन वही है सांसें अब 

ज़िंदगी कुछ नहीं है उसके बग़ैर

 

एक पल काटना भी मुश्किल है 

उम्र गुज़रेगी कैसे तेरे बग़ैर

 

सोचता हूँ के भूल जाऊँ तुझे

रह नहीं पाता तुझको सोचे बग़ैर

 

काश तू सुनता मेरे दिल की सदा 

बात करता है तुमसे बोले बग़ैर

 

कोई गुलशन कहाँ मुकम्मल है 

फूल तितली गुलाब भौंरे बग़ैर

 

ज़िंदगी ज़िंदगी नहीं है अब 

काटता हूँ जो रोज़ तेरे बग़ैर

 

अपने हालात क्या बताऊँ तुम्हें 

कैसे समझोगे हाल आये बग़ैर

 

दिल के ज़ख़्मों को जब भी देखोगे 

रह न पाओगे तुम भी रोये बग़ैर

 

रिश्तों में प्यार की नमी रखिए 

सूख जाते हैं फूल सींचे बग़ैर

 

देख लूँ इक निगाह भर के तुझे

दिल परेशॉ है तुझको देखे बग़ैर

 

आँख से आँख क्या मिली 'सूरज'

बस गया दिल में कोई पूछे बग़ैर

 

डॉ सूर्या बाली 'सूरज'

 

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ज़िंदगी का रंग फीका था मगर इतना न था

January 25, 2016 at 00:23

ज़िंदगी का रंग फीका था मगर इतना न था

इश्क़ में पहले भी उलझा था मगर इतना न था

 

क्या पता था लौटकर वापस नहीं आएगा वो

इससे पहले भी तो रूठा था मगर इतना न था

 

दिन में दिन को रात कहने का सलीका देखिये

आदमी पहले भी झूठा था मगर इतना न था

 

अब तो मुश्किल हो गया दीदार भी करना तिरा

पहले भी मिलने पे पहरा था मगर इतना न था

 

उसकी यादों के सहारे कट रही है ज़िंदगी

भीड़ में पहले भी तन्हा था मगर इतना न था

 

टुकड़ा टुकड़ा हो गया है ज़िंदगी का आईना

इससे पहले भी मैं टूटा था मगर इतना न था

 

उसके जाने से बढ़ी 'सूरज' मेरी तिष्नालबी

प्यार के दरिया में प्यासा था मगर इतना न था

 

डॉ सूर्या बाली 'सूरज'

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लम्हा लम्हा सदी पे भारी है

January 24, 2016 at 22:15

कश्मकश ज़िन्दगी में ज़ारी है

लम्हा लम्हा सदी पे भारी है

 

क्यूँ खुली रहती हैं मिरी पलकें

अब इन्हें किसकी इंतज़ारी है

 

इक नशा सा दिलो दिमाग़ पे है

बिन पिये कैसी ये ख़ुमारी है

 

धड़कनें दिल की ठहरी ठहरी हैं

जाने कैसी ये बेक़रारी है

 

दूसरा दिल में आ न पाएगा

दिल पे अब तेरी पहरेदारी है

 

भूल जाऊँ के याद रखूँ तुझे

बस यही जंग खुद से ज़ारी है

 

ग़म मुझे दे के दे खुशी 'सूरज'

अब तो ये ज़िन्दगी तुम्हारी है

 

डॉ सूर्या बाली 'सूरज'

 

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ज़िंदा तो आज भी हूँ मगर ज़िंदगी कहाँ

December 27, 2015 at 06:57

ले आई मुझको देख मेरी आशिक़ी कहाँ

ज़िंदा तो आज भी हूँ मगर ज़िंदगी कहाँ

 

हरसू है बेवफ़ाई दगा झूठ का धुंवा

दिल की खुली भी खिड़की तो जाके खुली कहाँ

 

कहने को आस पास तो खुशियाँ हैं बेशुमार

मिलती थी तेरे साथ मे जो वो खुशी कहाँ

 

मिलने को तो मिले हैं मुझे सैकड़ों हसीन

लेकिन तुम्हारे जैसी मिली चुलबुली कहाँ

 

जज़्बात अब तो दिल के मेरे संग हो गए

एहसास की चादर भी रही मखमली कहाँ

 

हिन्दू है कोई सिख तो मुसलमान कोई है

मुझको कोई बताए के है आदमी कहाँ

 

जो दूर कर दे दिल से अँधेरों के सिलसिले

'सूरज' बता दे मुझको है वो रौशनी कहाँ

 

डॉ सूर्या बाली 'सूरज'

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मुझको तुम्हारी याद ने सोने नहीं दिया

December 22, 2015 at 22:38

मुझको तुम्हारी याद ने सोने नहीं दिया

तन्हाइयों की भीड़ में खोने नहीं दिया

 

चाहा तो बार बार के हो जाऊँ बेवफ़ा

लेकिन तुम्हारे प्यार ने होने नहीं दिया

 

अब तो धुंवाँ धुंवाँ सी हुई मेरी ज़िंदगी

जलने दिया न, राख़ भी होने नहीं दिया

 

लब पे सजा लिए हैं तवस्सुम की झालरें

एहसास ग़म का दुनिया को होने नहीं दिया

 

आँखों में अश्क आप की आ जाएँ ना कहीं

इस डर से अपने आप को रोने नहीं दिया

 

अपना सका मुझे न किसी और का हुआ

मुझको किसी भी और का होने नहीं दिया

 

'सूरज' जो हमने देखा मुहब्बत में एक ख्वाब

पूरा उसे ज़माने ने होने नहीं दिया

 

डॉ सूर्या बाली 'सूरज'

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आ जाओ फिर से लौट के इक शाम के लिए

August 3, 2015 at 13:54

दिल के सुकून चैन ओ आराम के लिए

आ जाओ फिर से लौट के इक शाम के लिए

 

अब तो तिरे ख़याल में रहता हूँ रात दिन

मिलता कहाँ है वक़्त किसी काम के लिए

 

इस मैकशी नज़र से मिलाकर नज़र कहूँ

दिल जान जिगर ले लो बस इक जाम के लिए

 

रावन के भी बहुत से तरफ़दार हो गए

मुश्किल हुई है राह भी अब राम के लिए

 

तुमपे भला लगाऊँ क्यूँ इल्ज़ाम क़त्ल का

तुम तो महज़ बहाना थे इस काम के लिए

 

'सूरज' गवां दी तूने तो गफलत में ज़िंदगी

बख़्शी थी जो ख़ुदा ने किसी काम लिए

 

डॉ सूर्या बाली 'सूरज'

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मेरी आँखों को शिकायत है ज़माने भर से

April 30, 2015 at 11:04

एक अरसा हुआ दीदार को तेरे तरसे

मेरी आँखों को शिकायत है ज़माने भर से

 

दर्दे दिल टपका है पलकों से पिघल कर ऐसे

जैसे सावन में कहीं झूम के बादल बरसे

 

तुम अगर रूबरू मिल करके जुदा होते तो

बोझ हट जाता बिछड़ने का हमारे सर से

 

तुमसे हो जाएगी इक रोज़ मुलाक़ात कहीं

लेके उम्मीद यही रोज़ मैं निकला घर से

 

दिल लगा करके तुझे जब से अपना बनाया

हो गयी तब से अदावत भी ज़माने भर से

 

टूटकर दिल का महल हो गया वीरान मगर

आज भी तेरी सदा आती है बाम ओ दर से

 

बिखरे गुलदस्ते खुले ख़त से है जाहिर 'सूरज'

होके मायूस गया होगा कोई इस दर से

 

डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

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इतनी बेचैन सी घबराई सी धड़कन क्यूँ है

April 23, 2015 at 14:09

दिल में ठहरा हुआ तूफ़ान ये उलझन क्यूँ है

इतनी बेचैन सी घबराई सी धड़कन क्यूँ है

 

मुझको हो जाना था संजीदा बहुत पहले मगर

दिल में अब तक मिरे मासूम सा बचपन क्यूँ है

 

मेरे ख्वाबों में ख़यालों में बसा है तू ही

फिर ये वीरान सा एहसास का आँगन क्यूँ है

 

अब सुनाई नहीं देते हैं खनकते लम्हे

इतना ख़ामोश तेरे हाथ का कंगन क्यूँ है

 

हो चुके बंद मुलाक़ात के दरवाज़े जब

दिल ये पकड़े हुए उम्मीद का दामन क्यूँ है

 

जिसके ख़ातिर मैं ज़माने से लड़ा हूँ 'सूरज'

अब वही शख़्स मेरी ज़ान का दुश्मन क्यूँ है

 

डॉ सूर्या बाली सूरज

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जुल्फें वो खोलकर जो चलें हैं अदा के साथ

April 15, 2015 at 01:30

जुल्फें वो खोलकर जो चलें हैं अदा के साथ

आया हो जैसे झूम के सावन घटा के साथ

 

हलचल हुई है दिल के समंदर के दरमियाँ

फेंका जो उसने प्यार का कंकड़ अदा के साथ

 

सहरा लबों पे मेरे समंदर है आँख में

यादों की बारिसें भी हैं ग़म की घटा के साथ

 

शिकवे गिले भुला के चले आओ फिर से तुम

तुमको बुला रहा हूँ मैं अब इल्तिज़ा के साथ

 

महँका गयी है दिल के घर आँगन को दोस्तों

आई जो उसके प्यार की खुशबू हवा के साथ

 

मैं लाख चाहकर भी उसे भूलता नहीं

जाने ये कैसा रिश्ता है उस बेवफ़ा के साथ

 

उसने मेरा इलाज़ भी कुछ इस तरह किया

देता रहा वो ज़हर भी मुझको दवा के साथ

 

मुझको न चाहिए ये ज़माने की दौलतें

मुझको तो ज़िंदा रहना है अपनी अना के साथ

 

कागज़ की नाव डूब ही जाती है एक दिन

फिर कैसे अपनी निभती कभी बेवफ़ा के साथ

 

तुझमे ख़ुदा में फ़र्क नहीं रह गया है अब

लेता है तेरा नाम भी 'सूरज' खुदा साथ

 

डॉ. सूर्या बाली "सूरज"

 

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ज़िंदगी तो बस खुदा की दी हुई सौग़ात है

April 9, 2015 at 16:32

कब मेहरबानी किसी की कब कोई ख़ैरात है

ज़िंदगी तो बस खुदा की दी हुई सौग़ात है

 

यूं बदल देना ये किस्मत और क़ुदरत का लिखा

ना तुम्हारे बस में है ये ना हमारे हाथ है

 

ज़िंदगी के इस सफ़र में मैं अकेला ही नहीं

साथ मेरे तेरी यादों की हसीं बारात है

 

क्या कहूँ कैसे कहूँ मैं अपने दिल की दास्ताँ 

प्यास होठों पे लिए हूँ पलकों पे बरसात है

 

एक पल ये और कुछ भी सोचने देता नहीं

तेरी यादों का जो लश्कर जेहन पे तैनात है

 

ज़िंदगी भी खेल है रस्साकशी का दोस्तों

इक तरफ़ हैं ख़्वाहिशें तो इक तरफ औक़ात है

 

जब से दिल के अंजुमन में आ गयी उसकी महक

महँका महँका दिन है मेरा महँकी महँकी रात है

 

दूर जाकर भी वो 'सूरज' याद आता है बहुत

भूल पाये हम न उसको कुछ तो उसमे बात है

 

डॉ सूर्या बाली 'सूरज'

 

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छुपती है कहाँ प्यार की झंकार किसी से

July 11, 2014 at 12:12

छुपती है कहाँ प्यार की झंकार किसी से

जुड़ते हैं अगर दिल के कहीं तार किसी से

 

करना न कभी प्यार में तकरार किसी से

उठती है कहाँ इश्क़ में तलवार किसी से

 

इक दिल था मेरे पास जो वो लेके गया है

अब तुम ही कहो कैसे करूँ प्यार किसी से

 

आगाजे मुहब्बत में ये अंजाम हुआ है

डरता है ये दिल करने को इज़हार किसी से

 

दिल का जो तेरे हाल सुनेंगे तो हँसेंगे

करना न ग़मों का कभी इज़्कार किसी से

 

काशी भी मेरा है वही काबा भी वही है

मुझको न ज़माने में है दरकार किसी से

 

रौनक़ थी उसी से तो उसी से थी बहारें

होगा न चमन दिल का ये गुलज़ार किसी से

 

फूलों की तरह आज भी किरदार है अपना

हम रखते नहीं दिल में कभी खार किसी से

 

मैं तुझसे अलग होके कभी जी नहीं सकता

कहनी ये पड़ी बात कई बार किसी से

 

पर काटने को सब मेरा तैयार हैं ‘सूरज’

देखी नहीं जाती मेरी रफ़्तार किसी से

 

डॉ सूर्या बाली ‘सूरज’

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प्यार जब होगा तो सीने में चुभन भी होगी

July 6, 2014 at 20:38

प्यार जब होगा तो सीने में चुभन भी होगी

दरमियां दिल के मुहब्बत की अगन भी होगी

 

जाके परदेश मिला होगा बहुत कुछ लेकिन

दिल के कोने में कहीं यादे वतन भी होगी

 

राह में उसके अगर धूप गरम झोकें हैं

तो कहीं छांव कहीं ठंठी पवन भी होगी

 

प्यार जितना ही मुझे तुमसे जियादा होगा

उतना लाज़िम है रक़ीबों को जलन भी होगी

 

आँख रोएगी परेशान मेरा दिल होगा

याद जब तेरी सताएगी घुटन भी होगी

 

हौसले और उमीदों के सहारे चलना

मंज़िलें दूर हैं रस्ते में थकन भी होगी

 

लाख हंस हंस के छुपा ले तू गमों को फिर भी

तेरे चेहरे पे जुदाई की शिकन भी होगी

 

इतना मायूस शबे ग़म से न होना ‘सूरज’

रात के बाद उमींदों की किरन भी होगी

 

डॉ सूर्या बाली ‘सूरज’

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कहा किसने कि राहे इश्क़ में धोका नहीं है

June 20, 2014 at 19:52

कहा किसने कि राहे इश्क़ में धोका नहीं है

यहाँ जो दिखता है वो दोस्तों होता नहीं है

 

जो कुछ पाया ज़माने की नज़र में था हमेशा

गंवाया जो उसे इस दुनिया ने देखा नहीं है

 

गुज़ारी है वफ़ादारों में सारी उम्र मैंने

दग़ा करना किसी से भी मुझे आता नहीं है

 

मुझे मालूम है इक दिन जुदा होना है सबको

मगर ऐसे भी कोई दूर तो जाता नहीं है

 

मुहब्बत के सफ़र में हमसफ़र जितने थे मेरे

कोई भी साथ थोड़ी दूर चल पाया नहीं है

 

अज़ब है कश्मकश दिल की ज़ुदा होके भी तुमसे

कहाँ जाऊँ किधर जाऊँ समझ आता नही  है

 

तुम्हारे बाद भी आए बहुत से लोग लेकिन

मेरे दिल के करीब इतना कोई आया नहीं है

 

दग़ा मक्कारी धोका झूठ तेरी बेवफ़ाई

समझता है मेरा दिल भी कोई बच्चा नहीं है

 

तेरा हँसना तो देखा है सभी ने खूब ‘सूरज’

मगर तनहाई में रोता हुआ देखा नहीं है

 

 

डॉ सूर्या बाली ‘सूरज’

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रूह को जिस्म से जुदा कर दे

June 18, 2014 at 19:08

रूह को जिस्म से जुदा कर दे

ख़त्म साँसों का सिलसिला कर दे

 

भूल जाऊँ मैं उसकी यादों को

ये ख़ुदा कोई हादसा कर दे

 

दिल का लगना कहीं भी मुश्किल है

मेरी तनहाई खुशनुमा कर दे

 

जिक्र उसका न छेड़ बादे सबा

ज़ख्मे दिल फिर न ये हरा कर दे

 

दास्ताँ प्यार की मुकम्मल हो

तू भी इक बार तो वफ़ा कर दे

 

बागबाँ तू कभी न ग़म करना

फूल कोई अगर दग़ा कर दे

 

मिल सके जेह्न को सुकूँ ‘सूरज’

दर्दे दिल की कोई दवा कर दे

 

डॉ सूर्या बाली ‘सूरज’

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अब तिरी याद में कटे दिन भी

May 18, 2014 at 00:22

रात डसती थी डस रहे दिन भी

अब तिरी याद में कटे दिन भी

 

क्या कहें उनकी इन अदाओं को

दूर बैठे हैं वस्ल के दिन भी

 

क्यूँ शिकायत करूँ मैं रातों से

अब सियाही में ढल गए दिन भी

 

हमने काटीं है खार सी रातें

और देखें हैं गुल भरे दिन भी

 

ये शबे ग़म भी बीत जाएगी

बीत जाएँगे ये बुरे दिन भी

 

वो गए कहके आ रहे हैं अभी

फिर नहीं आए ईद के दिन भी

 

हमने देखा है उगते ‘सूरज’ को

हमने देखें हैं डूबते दिन भी

 

डॉ सूर्या बाली 'सूरज'

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जा तुझे अब सदा नहीं दूंगा

April 27, 2014 at 18:18

प्यार का वास्ता नहीं दूंगा

अब तुझे मैं सदा नहीं दूंगा

 

मैने दुश्मन बना लिया तुझको

अब कभी मशवरा नहीं दूंगा

 

लाख मुझको बुरा कहे लेकिन

मैं उसे बददुआ नहीं दूंगा

 

जान दे दूंगा बात आई तो

यार तुझ को दग़ा नहीं दूंगा

 

सच से इंकार जो करे उसको

मैं कभी आइना नहीं दूंगा

 

एक लम्हे के रूठ जाने से

ज़िंदगी तो मिटा नहीं दूंगा

 

प्यार से मैंने कर लिया तौबा

ज़ख्म दिल को नया नहीं दूंगा

 

ज़ख्म सहने की हद भी है सूरज

ख़ुद को इतनी सज़ा नहीं दूंगा

 

डॉ सूर्या बाली ‘सूरज’

वास्ता= संबंध का हवाला , सदा= आवाज़, मशवरा =सलाह, बारहा= बार बार, दग़ा =धोका 

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हर वक़्त मेरे दिल के उजालों में रहोगे

April 20, 2014 at 00:55

हर वक़्त मेरे दिल के उजालों में रहोगे

होके भी जुदा आप ख़यालों में रहोगे

 

चाहत को भुलाना मिरी आसान न होगा

माना के बहुत चाहने वालों में रहोगे

 

अब शेर ग़ज़ल नज़्म रुबाई की तरह तुम

हर वक़्त मुहब्बत के रिसालों में रहोगे

 

ले ले के मेरा नाम तुम्हें छेड़ेगी दुनिया

हर रोज़ ज़माने के सवालों में रहोगे

 

रानाई है जलवा है तिरा हुस्न है जब तक

तुम हुस्न की दुनिया के मिसालों में रहोगे

 

ताज़ा है अभी ज़ख्म भुला पाना है मुश्किल

मेहमान थे कुछ दिन तो ख़यालों में रहोगे

 

‘सूरज’ की कमी का तुम्हें एहसास न होगा

चाहत के चिरागों के उजालों में रहोगे

 

डॉ सूर्या बाली ‘सूरज’

 

रिसाला= मैगज़ीन, मिसाल= उदाहरण, रानाई= सुंदरता, छटा

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