डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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‘बस ऐसे ही भर गयी आँखे’ कहने वाला झूठा है !


कुछ तो दिल में पिघला होगा कुछ तो अंदर फूटा है !

‘बस ऐसे ही भर गयी आँखे’ कहने वाला झूठा है !!


लम्बी लम्बी परछाईं जब रफ़्ता रफ़्ता खो जाए,

कहती है तब साँझ सुहानी साथ किसी का छूटा है!


बिखरे हैं जज़्बात के मोती प्यार की माला टूटी है,

जबसे छूटा हाथ तुम्हारा आस का दामन छूटा है !


दिल के सूने शीशमहल में यूँ ही शोर नही बरपा,

तेरी यादों के पत्थर से शायद कुछ तो टूटा है!


तुमसे बिछड़कर दिल के चमन में पतझड़ जैसा मौसम है,

पत्ता पत्ता सूख चुका है  सूखा बूटा बूटा है !


दिल की धड़कन रूठी रूठी सांसें बैठी धरने पर,

जब से गए हो मन घायल है तन भी टूटा फूटा है !


दिल के सच्चे दर्द को ‘सूरज’ आख़िर अब किससे बाँटें,

लिखने वाला पढ़ने वाला सुनने वाला झूठा है !


डॉ सूर्या बाली “सूरज”

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