डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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ज़िंदा हूँ मगर जीने का एहसास नही है

इक उसके चले जाने से कुछ पास नही है

ज़िंदा हूँ मगर जीने का एहसास नही है



वो दूर गया जब से ये बेजान है महफिल

साग़र है सुराही हैं मगर प्यास नही है



सुनने को तिरे पास भी जब वक़्त नही तो

कहने को मिरे पास भी कुछ ख़ास नही है

 

इस रूह के आगोश में है तेरी मुहब्बत

माना के तिरा प्यार मिरे पास नही है



रावण तो ज़माने में अभी ज़िंदा रहेगा

क़िस्मत में अभी राम के बनवास नही है



फिर कैसे यक़ी तुझपे करेगा ये ज़माना,

ख़ुद तुझको ही जब अपने पे विश्वास नही है



लेकर तो चला आया समंदर में मैं कश्ती

हिम्मत के सिवा कुछ भी मिरे पास नहीं है



ये राहे वफ़ा का है सफ़र सोच समझ ले

बस काई पे चलना है यहाँ घास नही है 



रिश्ते जो उगे झूठ की मिट्टी में है ‘सूरज’

फूलेंगे फलेंगे ये मुझे आस नही है


डॉ सूर्या बाली ‘सूरज’

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