डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

header photo

ज़िंदा तो आज भी हूँ मगर ज़िंदगी कहाँ

December 27, 2015 at 06:57

ले आई मुझको देख मेरी आशिक़ी कहाँ

ज़िंदा तो आज भी हूँ मगर ज़िंदगी कहाँ

 

हरसू है बेवफ़ाई दगा झूठ का धुंवा

दिल की खुली भी खिड़की तो जाके खुली कहाँ

 

कहने को आस पास तो खुशियाँ हैं बेशुमार

मिलती थी तेरे साथ मे जो वो खुशी कहाँ

 

मिलने को तो मिले हैं मुझे सैकड़ों हसीन

लेकिन तुम्हारे जैसी मिली चुलबुली कहाँ

 

जज़्बात अब तो दिल के मेरे संग हो गए

एहसास की चादर भी रही मखमली कहाँ

 

हिन्दू है कोई सिख तो मुसलमान कोई है

मुझको कोई बताए के है आदमी कहाँ

 

जो दूर कर दे दिल से अँधेरों के सिलसिले

'सूरज' बता दे मुझको है वो रौशनी कहाँ

 

डॉ सूर्या बाली 'सूरज'

Go Back

Comments for this post have been disabled.