डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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रस्म ए उलफ़त की बात करते हैं

रस्म ए उलफ़त की बात करते हैं

हम मुहब्बत की बात करते हैं

 

वहशते ग़म के साथ रहके भी

हम मसर्रत की बात करते हैं

 

जो इशारे हैं उनकी आँखों के

सब शरारत की बात करते हैं

 

ज़िक्र होता है वस्ल का जब भी

वो क़यामत की बात करते हैं

 

पूछता है जो कोई हाले दिल

उसकी रहमत की बात करते हैं

 

दिल में क्या है बयां नहीं करते

बस सियासत की बात करते हैं

 

क्यूँ डरें इश्क़ में ज़माने से

हम बग़ावत की बात करते हैं

 

जो लुटेरे थे क्या हुआ उनको

क्यूँ हिफ़ाज़त की बात करते हैं

 

जिनको इल्मे वज़ू नहीं 'सूरज'

वो इबादत की बात करते हैं

 

डॉ सूर्या बाली 'सूरज'

1. उलफ़त =प्रेम 2. वहशते ग़म= दुख का डर 3. मसर्रत= खुशी 4. वस्ल= मिलन

5. रहमत= कृपा 6. सियासत= राजनीति 7. हिफ़ाज़त= सुरक्षा

8. इल्मे वज़ू = नमाज़ से पहले पानी से खुद को साफ करने का ज्ञान 7. इबादत = पूजा

 

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