डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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बेवफ़ा सुन ले तुझे प्यार किया है मैंने

साहब ए इश्क़1 को अफ़गार2 किया है मैंने

बेवफ़ा सुन ले तुझे प्यार किया है मैंने

 

कोई सौदागर ए ग़म3 हो तो इसे ले जाये

दर्द ओ ग़म को सरे बाज़ार किया है मैंने

 

दिल की दहलीज़4 पे रख के तेरी यादों के चिराग

हर शब-ए-हिज़्र5 को गुलज़ार किया है मैंने

 

दर्द पिघले तो न बहने लगे आँखों से कहीं

दिल के ज़ख़्मों को ख़बरदार किया है मैंने

 

उसकी रुसवाई6 न हो बज़्म7 की ग़ैरत8 भी रहे

चश्म ए पुरनम9 से ही गुफ़्तार10 किया है मैंने

 

बोझ दिल पे लिए आया था वो मुझसे मिलने

ऐसे इक वस्ल11 से इंकार किया है मैंने

 

वो मेरा होगा तो आएगा लौट के, उसको

फैसले के लिए मुख़्तार12 किया है मैंने

 

टूटी कश्ती में मुहब्बत का सफ़र है 'सूरज'

चाहतों को तिरी पतवार किया है मैंने

 

डॉ सूर्या बाली 'सूरज'

 

1. साहब ए इश्क़ = दिल 2.अफ़गार= घायल 3. सौदागर ए ग़म = दुख का व्यापारी 4.दहलीज़ = चौखट 5. शब-ए-हिज़्र=वियोग की रात 6. रुसवाई= बदनामी 7. बज़्म= महफिल 8. ग़ैरत =स्वाभिमान 9.आंसुओं से भीगी आँखें 10. गुफ़्तार= बातचीत 11. वस्ल= मिलन 12. मुख़्तार = स्वतंत्र, आज़ाद

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