डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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इतनी बेचैन सी घबराई सी धड़कन क्यूँ है

दिल में ठहरा हुआ तूफ़ान ये उलझन क्यूँ है

इतनी बेचैन सी घबराई सी धड़कन क्यूँ है

 

मुझको हो जाना था संजीदा बहुत पहले मगर

दिल में अब तक मिरे मासूम सा बचपन क्यूँ है

 

मेरे ख्वाबों में ख़यालों में बसा है तू ही

फिर ये वीरान सा एहसास का आँगन क्यूँ है

 

अब सुनाई नहीं देते हैं खनकते लम्हे

इतना ख़ामोश तेरे हाथ का कंगन क्यूँ है

 

हो चुके बंद मुलाक़ात के दरवाज़े जब

दिल ये पकड़े हुए उम्मीद का दामन क्यूँ है

 

जिसके ख़ातिर मैं ज़माने से लड़ा हूँ 'सूरज'

अब वही शख़्स मेरी ज़ान का दुश्मन क्यूँ है

 

डॉ सूर्या बाली सूरज

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