डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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ज़ख्म सहने की हदें सब, पार हम कर जाएंगे

October 5, 2011 at 21:59

ज़ख्म सहने की हदें सब, पार हम कर जाएंगे ।

वक़्त का मरहम लगेगा, घाव सब भर जाएंगे।

                    दिल मे अपने क़ैद कर रखा है मैंने आपको,

                    इतनी आसानी से कैसे आप बाहर जाएंगे।

आपके चेहरे पे साहब आपके आमाल हैं,

आईने को देख लेंगे आप तो डर जाएँगे।

                    आइये मैख़ाने में कुछ पल गुज़ारा जाए फिर,

                    लड़खड़ाते, झूमते, गाते हुए, घर जाएंगे।

हम दिलों-जाँ से उन्हे अपना बनाते ही गए,

क्या ख़बर थी बेवफ़ाई हमसे वो कर जाएँगे।

                    जब तलक तू पास है, बस तब तलक है ज़िंदगी,

                    बेवफा मत छोड़ के जा, वरना हम मर जाएँगे ।

जाँ हथेली पर लिए फिरते हैं “सूरज” आजकल,

वो न समझें धमकियों से उनकी हम डर जाएँगे॥

                                              डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

 

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