डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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वो हादसे जो मेरी ज़िंदगी मे आते गए....

वो हादसे जो मेरी ज़िंदगी मे आते गए,

कभी हसाते गए तो कभी रुलाते गए।

                       उजाड़ देता था वो रोज आशियाने को,

                       और एक हम थे मुकर्रर जिसे बनाते गए।

भरम तो रखना था मदहोश निगाहों का भी,

हम भी बस पीते गए और वो पिलाते गए।

                       हर एक मोड पे पत्थर जो मुझसे टकराए,

                       राह चलने के सलीके सभी सिखाते गए।

कल की सब याद बहुत आए थे “सूरज” वो हमें,

नाम लिख लिख के हथेली पे हम मिटाते गए।

                        -डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज “

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