डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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ग़म-ए-ज़िंदगी से डरके मैं रोया कभी नहीं

December 21, 2011 at 14:49

ग़म-ए-ज़िंदगी1 से डरके मैं रोया नहीं कभी॥

अश्क़ों2 से अपने गाल भिगोया नहीं कभी॥


हर सिम्त3 है धुआं यहाँ हर सिम्त आग है,

इस खौफ़4 से ही चैन से सोया नहीं कभी॥


दिल में जिगर में था वही साँसों में था वही,

आँखों के सामने से वो खोया नहीं कभी॥


ख़ुशबू बदन की उसके ना उड़ जाये इसलिए,

बिस्तर की अपने चादरें धोया नहीं कभी॥


लेकर बहुत से दर्द वो चुपचाप मर गया,

कांटे किसी की राह मे बोया नहीं कभी॥


मज़बूरियाँ थी ज़िंदगी भर साथ में मगर,

रिश्तों को बोझ समझ के ढोया नहीं कभी॥


यह सोचकर कि फूल के सीने में भी है दिल,

“सूरज” सुई से हार पिरोया नहीं कभी॥


                                डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

ग़म-ए-ज़िंदगी1 =जीवन का दुख, अश्क़2 = आँसू,  सिम्त3= दिशा,  खौफ़4=डर

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