डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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हर तरफ जंग की तस्वीर नई होती है

जब कभी अम्न की तदबीर नई होती है॥

हर तरफ जंग की तस्वीर नई होती है॥

 

ख़त्म कर देती है सदियों की पुरानी रंजिश,

वक़्त के हाथ में शमशीर नई होती है॥

 

पहले होते हैं यहाँ क़त्ल धमाके दंगे,

और फिर अम्न पे तक़रीर नई होती है॥

 

मेरे हर ख़्वाब में आता है नज़र तू ही तू,

फिर भी हर ख़्वाब की ताबीर नई होती है॥

 

गुल हो या ख़ार यहाँ जो भी बनाता है ख़ुदा,

उसके हर चीज की ता’मीर नई होती है॥

 

मेरा अंदाज़ ए बयां चाहे पुराना हो मगर,

मेरे हर लफ़्ज़ की तासीर नई होती है॥

 

आजकल के वो ज़माने का है राँझा यारों

रोज़ बाहों में कोई हीर नई होती है॥

 

जब भी होता है हसीं ताजमहल का चर्चा,

सामने प्यार की जागीर नई होती है॥

 

रोज़ आज़ादी का लिखता हूँ फ़साना “सूरज”

रोज़ ही पाँव मे ज़ंजीर नई होती है॥

डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

 

*तदबीर=निर्माण ,तक़रीर =बहस ,ताबीर= स्वप्नफल , तामीर =बनावट तासीर=प्रभाव, गुण

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