डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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सोंधी सोंधी माटी से महकी महकी पुरवाई है

सोंधी सोंधी माटी से महकी महकी पुरवाई है।

सावन भीगा भीगा है काली बदली भी छाई है॥

 

बहकी बहकी चाल है उसकी मदहोशी है आँखों में,

भीगे भीगे कपड़ों में क़लियों जैसी शरमाई है॥

 

फूंकेगी घर तेरा भी तू भी बस्ती में रहता है,

छुप के तूने घर में मेरे ये जो आग लगाई है॥

 

आज हुई मालूम हक़ीक़त प्यार के झूठे वादों की,

जिसको दिल दे रखा मैंने वो कितनी हरजाई है॥

 

कंकरीली पथरीली राहों पे भी चलना पड़ता है,

मंज़िल भी उसको मिलती है जिसने ठोकर खाई है॥

 

साहिल पर आती लहरों को देख के खुश हैं सब लेकिन,

पूछे कौन समन्दर से तुझमें कितनी गहराई है॥

 

बहुत अँधेरा, तन्हाई है ख़ामोशी, सूनापन भी,

ख़ाबों में आकर के किसने मेरी नीद चुराई है॥

 

अगर दबी हो गर्दन तेरी पाँव के नीचे क़ातिल के,

तलवों को सहलाते रहना ही यारो दानाई है॥

 

चैन नहीं लेने लेती देती है तनहाई में भी “सूरज”,

आँधी तेरे याद की जब से दिल के भीतर आई है॥

                              डॉ. सूर्या बाली “सूरज”

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