डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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सूरज सफ़र में है तेरी यादों के साथ साथ

November 24, 2013 at 18:24

बेघर हुए हैं ख़्वाब धमाकों के साथ साथ।

वहशत भी ज़िंदा रहती है साँसों के साथ साथ॥

 

जब रौशनी से दूर हूँ कैसी शिकायतें,

अब उम्र कट रही है अँधेरों के साथ साथ॥

 

दरिया को कैसे पर करेगा वो एक शख़्स,

जिसने सफ़र किया है किनारों के साथ साथ॥

 

वीरान शहर हो गया जब से गया है तू,

हालांकि रह रहा हूँ हजारों के साथ साथ॥

 

पत्ता शजर से टूट के दरिया पे जो गिरा,

आवारा वो भी हो गया मौजों के साथ साथ॥

 

मुद्दत हुई की नींद चुरा ले गया कोई,

कटती है अब तो रात सितारों के साथ साथ॥

 

इस जीस्त के सफ़र में भी तन्हा नहीं रहा,

“सूरज” सफ़र में है तेरी यादों के साथ साथ॥

 

डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

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