डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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साँचे मे अपने आप को ढलने नहीं देते

October 28, 2011 at 23:39

साँचे मे अपने आप को ढलने नहीं देते।

दिल मोम का रखते हैं पिघलने नहीं देते॥


इक बार बना लेते हैं मेहमान जिसे हम,

खाना-ए-दिल से उसको निकलने नहीं देते॥


मौक़ा ही नही देते बराबर हम किसी को,

दुश्मन को कभी गिरके सम्हलने नहीं देते॥


जो छीन ले चैन-ओ-अमन, आराम किसी का,

हम ऐसे ख्वाब आँख मे पलने नहीं देते॥


है कितने बेरहम मेरे गुलशन के बाग़बाँ,

गुल प्यार मोहब्बत का ये खिलने नहीं देते॥


दुनिया उठा ले कितने ही तूफ़ान, ज़लज़ले,

बुनियाद-ए-इश्क़ हम कभी हिलने नहीं देते॥


कांटो से सज़ा रखी है ये राह-ए-ज़िंदगी,

फूलों की तरफ दिल को मचलने नहीं देते॥


रहता नहीं अंधेरा मेरे पास मे क्यूँ की,

“सूरज” कभी उम्मीद का ढलने नहीं देते॥


                      डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

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