डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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सच बात को भी झूठ बताने लगी कलम

सच बात को भी झूठ बताने लगी कलम।

ना जाने कैसी राह पे जाने लगी कलम॥

मज़लूम बेगुनाह मुफ़लिसों को छोडकर,

अब क़ातिलों का साथ निभाने लगी कलम॥

उठने लगी हैं अब तो कातिब पे उँगलियाँ,

अब शक के दायरे में भी आने लगी कलम॥

अपने ही घर के राज़ सरे-आम करके अब,

चैनों-अमन में आग लगाने लगी कलम॥  

दुनिया को देके रोज़ सदाक़त का मशवरा,

ख़ुद झूठ की दुकान सजाने लगी कलम॥

बस चंद कलमकारों ने रुशवा किया इसे,

रो रो के अपना हाल सुनाने लगी कलम॥

“सूरज” बदलते दौर के अंदाज़ देख कर,

अब कैसे कैसे रंग दिखाने लगी कलम॥

 

                  डॉ. सूर्या बाली “सूरज”

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