डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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शाख़ से टूटा हुआ पत्ता किधर जाएगा

January 5, 2012 at 14:23

शाख़ से टूटा हुआ पत्ता किधर जाएगा।

रुख़ हवाओं का जिधर होगा उधर जाएगा॥

 

प्यार जब आँखों से इस दिल में उतर जाएगा॥

दिल पे कर लेगा हुकूमत औ ठहर जाएगा॥

 

तुम जो बेपर्दा कभी हो के चमन में आओ,

रंग फूलों और कलियों का निखर जाएगा॥

 

बहुत नाज़ुक है ज़रा खेलो सँभलकर इससे,

शीश-ए-दिल जो अगर टूटा बिखर जाएगा॥

 

क़समें खाता था बहुत वादे किया करता था,

क्या पता था सरे-महफिल वो मुक़र जाएगा॥

 

साथ ग़र तू है तो ग़म कोई नहीं है “सूरज”,

वक़्त कैसा भी हो हंस रो के गुज़र जाएगा॥

 

                  डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

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