डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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शहर का आदमी अब गाँव जाना चाहता है,

ग़ज़ल

शहर का आदमी अब गाँव जाना चाहता है,

सुकून, आराम, खुशियाँ , चैन पाना चाहता है।

                          सांस लेना हुआ दुश्वार, पत्थरों के जंगल में,

                          बगीचे गाँव के फिर से सजाना चाहता है ।

दीवारों मे सिमट के रह गया जो रात-दिन ,

खुले आकाश मे कुछ पल बिताना चाहता है।

                         डर गया है, क़त्ल, बारूदी धमाके देखकर,

                         दिन ब दिन के हादसों से दूर जाना चाहता है।

कुछ न पाया चल के तन्हा इक उदासी के सिवा,

रिश्ते नातों का घरौंदा फिर बनाना चाहता है।

                               -डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

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