डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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शम्मा का रिश्ता हो जैसे किसी परवाने से

शम्मा का रिश्ता हो जैसे किसी परवाने से।

दोस्ती ऐसी है, साक़ी तेरे मयख़ाने से॥

                   जाम भर भर के पिला, आंखो के पैमाने से,

                   क्या मिलेगा तुझे, मैनोस को तड़पाने से।।

पीते हैं सब, कोई चुपके से, सरे-आम कोई,

कभी आँखों से, कभी होठों के पैमाने से॥

                  शौक़-ए-मैनोसी है हर टूटे हुए दिल की दवा,

                  ज़ख्म भर देती है बस जाम के टकराने से॥

एक मैं ही नहीं; जो पीता हूँ चोरी चोरी,

छुप के आते हैं यहां कितने ही बुतख़ाने से।।

                    बेख़ुदी मे जियो और खुल के जाम टकराओ,

                    वरना प्यासे रहोगे, इस तरह शर्माने से।

महफिल-ए-रिन्द की रौनक तुम्ही से है साक़ी,

रूठ जायेगी बज़्म, तेरे चले जाने से॥

                   कसमें खाई है कई बार फिर न पीने की,

                    टूट जाती हैं ये हर बार यहां आने से।।

कहा “सूरज’ से कई बार छोड़ दे पीना,

बाज आता ही नहीं, लाख ये समझाने से॥

                                                डॉ॰सूर्या बाली “सूरज”

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