डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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वफ़ा कि राह में सब कुछ लुटा दिया अपना

July 15, 2013 at 17:27

वफ़ा कि राह में सब कुछ लुटा दिया अपना॥

मगर न बदला मुहब्बत का फलसफ़ा अपना॥

 

बड़े खुलूस से है तुझको मशवरा अपना।

हर एक शख़्स को देना नहीं पता अपना॥

 

दिलों के बीच मुहब्बत के गुल खिलाता गया,

जहाँ- जहाँ से भी गुजरा है काफ़िला अपना॥

 

तुम्ही बता दो भला गुफ्तगू करूँ किससे,

सिवा तुम्हारे किसी से न राब्ता अपना॥

 

हम एक दूजे से चुपचाप हो गए है अलग,

ज़रा सी बात पे टूटा है सिलसिला अपना॥

 

कुछ इस अदा से दिखा के वो चाँद सा चेहरा,

बस एक पल में दिवाना बना गया अपना॥

 

ये चंद साँसे भी हैं मौत से उधार मिली,

यहाँ पे कुछ भी नहीं दोस्त आपका अपना॥

 

हमें तो घर के चरागों से ही मुहब्बत है,

नहीं है चांद सितारों से वास्ता अपना॥

 

निगाह दूर तलक ढूढ़ती रही तुमको,

तुम्हें ख़बर ही नहीं हाल क्या हुआ अपना॥

 

किसी की ज़ुल्फ मेरे रुख़ पे हवा करती रही,

किसी की सानों पे सर रातभर रहा अपना॥

 

मुझे तो अपने ही कदमों का बस भरोसा है,

न हमसफ़र न ये मंज़िल न रास्ता अपना॥

 

बस आंखमूद के सबको गले लगाता हूँ,

हर एक बशर में मुझे दिखता है ख़ुदा अपना॥

 

किया कभी न तिजारत मैं अपने पेशे में,    

कभी भी देखा नहीं हमने फ़ायदा अपना॥

 

शरर से आग से “सूरज” से बच गया लेकिन,

कली से फूल से तितली से दिल जला अपना॥

 

डॉ. सूर्या बाली “सूरज”

1. फलसफ़ा= नीति, दर्शन 2.  मशवरा=सलाह 3. सानों=कंधों , 4. रुख़= चेहरा , 5. बशर=आदमी 

6. =व्यापार 7. शरर = चिंगारी 

       

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