डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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वो मेरा दोस्त है दुश्मन है न जाने क्या है

September 1, 2013 at 01:18

वो मेरा दोस्त है दुश्मन है न जाने क्या है।

वो मेरी मौत है धड़कन है न जाने क्या है॥

 

क्यूँ जुदा हो के भी हर वक़्त उसी को सोचूँ,

ये रिहाई है कि बंधन है न जाने क्या है॥

 

बस उमीदों के सहारे ही चला जाता हूँ,

आगे सहरा है कि गुलशन है न जाने क्या है॥

 

हमसफ़र बन के कोई साथ चला है लेकिन,

वो मुहाफ़िज़ है कि रहजन  है न जाने क्या है॥

 

देखकर चाल चलन उसकी है कहना मुश्किल,

वो कुँवारी है कि दुल्हन है न जाने क्या है॥

 

ख़ुद से करता हूँ अकेले में बहुत सी बातें,

बेखुदी है कि ये उलझन है न जाने क्या है॥

 

मुफ़लिसी ने मेरी पहचान मिटा दी “सूरज”,

ये बुढ़ापा है कि बचपन है न जाने क्या है॥

 

डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

 

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