डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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वो दर्द में मुस्करा रहा है

वो दर्द में, मुस्करा रहा है॥

सभी को जीना सिखा रहा है॥

            दिया ज़माने ने ग़म उसे जो,

            वो मयकदे मे भुला रहा है॥

बहुत पशेमां है इसलिए वो,

सभी से नज़रें चुरा रहा है॥ 

            वो पेट ख़ातिर, शरीर बेंचे,

            अज़ीब क़ीमत चुका रहा है॥

मरीज तो मर चुका है कब का,

दवा वो अब भी पिला रहा है॥

            वो बेंच करके ज़मीर अपना,

            मक़ाम ऊंचा बना रहा है॥        

कोई दरिंदा किसी बहू को,

दहेज ख़ातिर जला रहा है॥

            नज़र टिकी है कहीं पे उसकी,

            कहीं निशाना लगा रहा है॥

गुनाह जिसने किया ए “सूरज”,

उसी को मुंसिफ़ बचा रहा है॥

 

                              डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

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