डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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लंबी गाड़ी ऊंचे बंगले शान अब होने लगे

लंबी गाड़ी ऊंचे बंगले शान अब होने लगे।

सब दिखावे के लिए सामान अब होने लगे॥

 

बेंच कर अपनी अना ईमान अच्छाई ज़मीर,

चंद सिक्कों के लिए हैवान अब होने लगे॥

 

मर रहे हैं कर्ज़ के बोझों से दबकर के किसान,

खेत से खलिहान तक शमशान अब होने लगे॥

 

कल तलक जो दाने दाने के लिए मोहताज थे,

देखिये इस शहर के धनवान अब होने लगे॥

 

ज़िंदगी अब बोझ लगती है बुज़ुर्गों की यहाँ,

बाप माँ अपने ही घर मेहमान अब होने लगे॥

 

हर तरफ फैले हुए हैं ईंट पत्थर के मकान,

खेत जंगल बाग सब वीरान अब होने लगे॥

 

चाँद मंगल और एलियन से बहुत वाक़िफ़ हैं हम,

साथ रहने वालों से अंजान अब होने लगे॥

 

लूट भ्रष्टाचार घोटाले  में हैं शामिल सभी,

राजनेता आज के बेईमान अब होने लगे॥

 

बात अब इंसानियत की क्या करूँ “सूरज” वहाँ,

खून के प्यासे जहां इंसान अब होने लगे॥

  

डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

 

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