डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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रिश्ते नाते बिखरने का डर हो गया

November 29, 2011 at 02:30

उसकी बातों का दिल पे असर हो गया।

रिश्ते नाते बिखरने का डर हो गया॥


उँगलियाँ थाम कर मेरी चलता था जो,

आज मेरा वही राहबर2 हो गया॥


वो परेशान दुनिया से था इस क़दर,

इसलिए मयकदा3 उसका घर हो गया॥


इक कदम क्या ग़लत राह मे उठ गया,

खो गईं मंज़िलें, दर बदर हो गया॥


सब गए भूल इंसानियत का सबक़4,

जाति मज़हब5 का ऐसा असर हो गया॥


फूल काँटे का रिश्ता नहीं है कोई,

साथ रहने का बस इक हुनर हो गया॥


दो कदम क्या चला साथ मिलके मेरे ,

उसको लगने लगा हमसफ़र हो गया॥


झूँठ कहता था जब, कारवां साथ था,

सच जो बोला तो तन्हा सफर हो गया॥


क्यूँ गिला6 दूसरों से ये "सूरज" करें,

ग़ैर अपना ही लख़्त-ए-जिगर7 हो गया॥

                               डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

1. ज़र=दौलत, पैसा 2. राहबर=पथ प्रदर्शक 3. मयकदा= शराबखाना 4. सबक़=पाठ

5. मज़हब =धर्म 6. गिला= शिकायत 7. लख़्त-ए-जिगर=जिगर का टुकड़ा, औलाद

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