डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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ये तो माया है रब की, मै क्या कहूं

दुनिया के उल्टी रीति की यारों, आओ दिखाऊँ झलकी।

मै क्या कहूँ, ये तो माया है रब की, मै क्या कहूँ॥

गया पहाड़ पे, पत्थर का एक टुकड़ा ढूंढ के लाया।

ले कर छेनी और हथौड़ी, मूरत एक बनाया॥

मैं बेचारा भूंखा सोऊँ, मूरत चांपे बर्फी।

मै क्या कहूँ, ये तो माया है  रब की, मै क्या कहूँ॥

ईंटा गारा कर के हमने, मंदिर इक बनवाया।

बन चुन के तैयार हुआ तो, मै ही न घुस पाया॥

कहें अछूत है, घुसने न दे, ऐसी उनकी मर्जी।

मै क्या कहूँ, ये तो माया है  रब की, मै क्या कहूँ॥

जिसने सारी दुनिया बनाई, उसके लिए घर बनवाते है।

पत्थर पीते दूध, दही और बच्चे भूंखे सो जाते हैं।।

हद हो गयी है “सूरज” देखो इनके पागलपन की।

मै क्या कहूँ, ये तो माया है  रब की, मै क्या कहूँ॥

                                  डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

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