डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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मैं कई रात भूखे पेट रह के सो लूँगा

मैं कई रात भूखे पेट रह के सो लूँगा।

                  दर्देदिल जब भी सताएगा, छुप के रो लूँगा।

ज़िंदगी तेरे इशारे पे ही तो चलता हूँ,

                  तू मुझको जैसा कहेगी मैं वैसे हो लूँगा!

मै तो शायर हूँ, किसी का कोई ग़ुलाम नहीं,

                  दिल मे जो आएगा, मैं दिल से वही बोलूँगा।

थोड़ा हटके हूँ जमाने से, मगर ऐसा नहीं,

                  कि हाथ बहती हुई गंगा मे जाके धो लूँगा।

कारवां का मैं इक भटका हुआ मुसाफिर हूँ,

                  राह मे जो भी मिलेगा उसी का हो लूँगा।

भरा है बेपनाह दर्द खाना-ए-दिल में,

                  तू मिलेगा कभी तो राज-ए-दिल ये खोलूँगा।

 

                                          डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”  

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