डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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मेरी चाहत मेरी उलफ़त आशिक़ी तुम हो गए।

October 6, 2013 at 10:36

मेरी चाहत मेरी उलफ़त आशिक़ी तुम हो गए।

अजनबी इस ज़िंदगी की हर खुशी तुम हो गए॥

 

कुछ मुलाकातों में तुम जाने न मेरे क्या हुए,

दिल हुए धड़कन हुए फिर ज़िंदगी तुम हो गए॥

 

तुमसे मेरे गीत ग़ज़लें नज़्म फिर रौशन हुईं,

ज़िंदगी के साज़ सुर आवाज़ भी तुम हो गए॥

 

रात हो दिन हो सबेरा हो या कोई शाम हो,

अब ख़यालो ख़्वाब में हर पल तुम्ही तुम हो गए॥

 

ज़िंदगी में हर तरफ था स्याह अँधियारा बहुत,

चाँद “सूरज” बन के आए रौशनी तुम हो गए॥

 

डॉ सूर्या बाली “सूरज”

 

 

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