डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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मुझे जबसे मोहब्बत हो गयी है

मुझे जबसे मोहब्बत हो गयी है॥

ज़माने को शिकायत हो गयी है॥


उसी की बंदगी1 उसकी इबादत2,

मोहब्बत में ये हालत हो गयी है॥


लगे हैं इश्क़ पे पहरे बहुत से,

बड़ी मुश्किल में चाहत हो गयी है॥


खरीदो शौक़ से बेचो इसे तुम,

मोहब्बत अब तिजारत3 हो गयी है॥


कभी तनहाइयाँ डँसती बहुत थीं,

मुझे अब इनकी आदत हो गयी है॥


मिलाया हाथ मैंने जब से तुमसे,

ज़माने से अदावत4 हो गयी है॥


नज़र जबसे मिली है तुम से “सूरज”

अज़ब दिल पे क़यामत हो गयी है॥


                        डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

 

1. बंदगी = भक्ति, 2. इबादत= पूजा 3. तिजारत= व्यापार 4. अदावत= दुश्मनी

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