डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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बस्तियाँ हो गईं वीरान कहीं और चलें

शहर ये हो गया शमशान कहीं और चलें॥

बस्तियाँ हो गईं वीरान कहीं और चलें॥

 

खो गयी चेहरे की मुस्कान कहीं और चलें॥

ज़िंदगी हो गयी बेज़ान कहीं और चलें॥

 

कोई हिन्दू कोई मुस्लिम कोई ईसाई है,  

है नहीं कोई भी इंसान कहीं और चलें॥

 

कोई जोरू से कोई ज़र से ज़मीं से कोई,

हैं सभी लोग परेशान कहीं और चलें॥

 

आईना अंधों की बस्ती में बेंचता था मैं, 

चल सकी न मेरी दूकान कहीं और चलें॥

 

दोस्त दुश्मन सभी चेहरे पे लगाए चेहरे,

कर सका मैं नहीं पहचान कहीं और चलें॥

 

जागने और जगाने की बात किससे करें,

यहाँ तो सोया है भगवान कहीं और चलें॥

 

देख के शहर के नालों की रवानी “सूरज”,

गंगा जमुना भी है हैरान कहीं और चलें॥

 

                  डॉ. सूर्या बाली “सूरज”

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