डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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फिर से उम्मीदें जगी हैं फिर से जीने की तलब है

फिर से उम्मीदें जगी हैं फिर से जीने की तलब है ।

दिल को अब महबूब के आँखों से पीने की तलब है॥

 

रात काली दूर साहिल तेज तूफ़ानों के झोंके,

पार दरिया जो करा दे उस सफ़ीने1 की तलब है॥

 

झूँठ चोरी बेईमानी में नहीं लगता कभी दिल,

मुझको मौला तू बुला ले अब मदीने की तलब है॥

 

जोश भर दे मुल्क़ के हर आदमी के दिल जिगर में,

फिर किसी गांधी के जैसे ही नगीने की तलब है॥

 

भूक से रो रो के थक के सो गया बच्चा जो “सूरज”

फिर से उसको माँ के आँचल माँ के सीने की तलब है॥

 

                        डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

1॰ सफ़ीना = नाव, कश्ती

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