डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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दोस्तों आज फिर मचल के पियो

March 18, 2012 at 22:55

दोस्तों आज फिर मचल के पियो॥

ग़म के साये1 से अब निकल के पियो॥

ज़िंदगी कल तलक रहे न रहे,

जाम सबसे अदल-बदल के पियो॥

रात मदहोश है नशे में बहुत,

आज फिर बाम2 पे टहल के पियो॥

आज मौक़ा भी है ख़ुशी भी बहुत,

गाओ नाचो उछल उछल के पियो॥

बैठकर मयकदे3 में पी है बहुत,

शेख़ मस्जिद में साथ चल के पियो॥

      देख “सूरज” भी है उफ़क़4 पे खड़ा, 

      हो गई है सुबह सँभल के पियो॥

                        

                                                     डॉ. सूर्या बाली “सूरज”


1. साया= परछाई 2. बाम= छत 3. मयकदा = शराबघर 4. उफ़क़ = क्षितिज

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