डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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तुम्हारी पहले सी नज़रे-इनायत क्यूँ नहीं होती

April 21, 2012 at 13:30

तुम्हारी पहले सी नज़रे-इनायत क्यूँ नहीं होती॥

मेरे टूटे हुए दिल की मरम्मत क्यूँ नहीं होती॥


कभी तो गालियों पे भी तुम्हारे प्यार आता था,

तेरी अब रस भरी बातों से उलफ़त क्यूँ नहीं होती॥


जो छोटी छोटी बातों पे लड़ाई मुझसे करता था,

उसे अब गालियों से भी शिकायत क्यूँ नहीं होती॥


मेरे कांधे पे सर रख कर कभी जो रोया करते थे,

अब उनको मुझसे मिलने की ज़रूरत क्यूँ नहीं होती॥


मुझे लगता है तुमने दूसरा दर देख रखा है,

तुझे अब मेरे घर आने की फुर्सत क्यूँ नहीं होती॥


ये ग़लती बागवाँ की है या साज़िश है बहारों की,

वो जब तितली है तो फूलों की चाहत क्यूँ नहीं होती॥


जला देती है शक की छोटी सी चिंगारी रिश्तों को,

जो रिश्ते ख़ास हैं उनकी हिफ़ाज़त क्यूँ नहीं होती॥


सुना है शोख़ जलवों से क़यामत सब पे ढाती हो,

तुम्हारे हुस्न की मुझपे क़यामत क्यूँ नहीं होती॥


बहुत नादान है “सूरज” कोई इसको तो बतलाए,

अमीरों को गरीबों से मोहब्बत क्यूँ नहीं होती॥

 

                                    डॉ. सूर्या बाली “सूरज”

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