डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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तन्हाइयों का ज़ख्म कभी भर नहीं सका

तन्हाइयों का ज़ख्म कभी भर नहीं सका॥

कोई इलाज़ दिल पे असर कर नहीं सका॥

 

इक टीस बेबसी है मेरे दिल के आस पास,

इक दर्द है जो सबसे बयां कर नहीं सका॥

 

दिल में तुम्हारी यादें हैं महफ़ूज आज भी,

यादों को तेरी ख़ुद से जुदा कर नहीं सका॥

 

आओगे तुम कभी न कभी मुझको देखने,

इस इंतज़ार में ही कभी मर नहीं सका॥

 

रह रह के याद आती हैं अठखेलियाँ तेरी,

बाहों में तुमको देर तलक भर नहीं सका॥

 

अब भी वहीं खड़ा हूँ जहां छोड़ के गए,

तन्हा ये ज़िंदगी का सफ़र कर नहीं सका॥

 

अफ़सोस तो रहेगा ये “सूरज” को उम्र भर,

झोली तुम्हारी खुशियों से वो भर नहीं सका॥

 

                           डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

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