डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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जा तुझे अब सदा नहीं दूंगा

प्यार का वास्ता नहीं दूंगा

अब तुझे मैं सदा नहीं दूंगा

 

मैने दुश्मन बना लिया तुझको

अब कभी मशवरा नहीं दूंगा

 

लाख मुझको बुरा कहे लेकिन

मैं उसे बददुआ नहीं दूंगा

 

जान दे दूंगा बात आई तो

यार तुझ को दग़ा नहीं दूंगा

 

सच से इंकार जो करे उसको

मैं कभी आइना नहीं दूंगा

 

एक लम्हे के रूठ जाने से

ज़िंदगी तो मिटा नहीं दूंगा

 

प्यार से मैंने कर लिया तौबा

ज़ख्म दिल को नया नहीं दूंगा

 

ज़ख्म सहने की हद भी है सूरज

ख़ुद को इतनी सज़ा नहीं दूंगा

 

डॉ सूर्या बाली ‘सूरज’

वास्ता= संबंध का हवाला , सदा= आवाज़, मशवरा =सलाह, बारहा= बार बार, दग़ा =धोका 

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