डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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छाने लगे हैं प्यार के बादल इधर उधर

जब से हुई है आप की हलचल इधर उधर।

छाने लगे हैं प्यार के बादल इधर उधर॥

 

सहरा-ए-दिल में खिलने लगे प्यार के कंवल,

लहरा गया जो आप का आँचल इधर उधर॥

 

लगता है रात तुमने गुज़ारी है जागकर,

फैला हुआ है आँख का काजल इधर उधर॥

 

चुपके से आ भी जाइये आगोश में मेरे,

छनकाइये न पाँव की पायल इधर उधर॥

 

लगता है नंगे पाँव कोई चल के है गया

बिखरा हुआ है घास का मखमल इधर उधर॥

 

तितली के रंग और महक में गुलाब के,

मौजूदगी उसी की मुसल्सल इधर उधर॥

 

पलकें बिछाएँ चाँद सितारे तेरे लिए,

“सूरज” भी बनके घूमे है पागल इधर उधर॥

 

                  डॉ. सूर्या बाली “सूरज”

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