डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

header photo

घूमता हूँ मै अकेला ग़म के मारों की तरह

October 30, 2011 at 19:10

घूमता हूँ मै अकेला ग़म के मारों की तरह।

ज़िंदगी तेरे बिना लगती है ख़ारों की तरह ॥


चोट करती हैं तेरी यादों कि लहरें रात दिन,

टूटता रहता हूँ दरिया के किनारों की तरह॥


हो रही बरसात मुझपे रौशनी की आजकल,

आप आए ज़िंदगी मे चाँद-तारों की तरह॥   


खिल गईं है सारी कलियाँ मुस्कराया ये चमन ,

जब से आयें हैं वो गुलशन मे बहारों की तरह॥


वो तुझे कुछ भी कहे “सूरज”, मगर मेरे लिए,

है तेरा एहसास सावन की फुहारों की तरह॥

   
                                डॉ॰ सूर्या बाली “ सूरज”

Go Back

Comments for this post have been disabled.