डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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कितनी बेबस हो गयी है इस शहर की ज़िंदगी

कितनी बेबस हो गयी है इस शहर की ज़िंदगी।

रास अब आती नहीं मुझको इधर की ज़िंदगी॥


हो गया ख़ुदगर्ज(1) इतना आजकल का आदमी,

लग रही बेवा के जैसे हर बशर(2) की ज़िंदगी॥


मुतमइन(3) हूँ जुगनुओं की ही तरह जलकरके मैं,

चाहिए मुझको नहीं शम्स-ओ-क़मर(4) की ज़िंदगी॥


हर तरफ बारूद के इक ढेर पे इन्सान है,

मौत के साये में है आठों पहर की ज़िंदगी॥


रौशनी “सूरज” कभी रहती नहीं हरदम कहीं,

शाम को ढल जाएगी ये दोपहर की ज़िंदगी॥


                                 डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

1॰ ख़ुदगर्ज़= स्वार्थी     2. बशर=आदमी  3॰ मुतमइन = संतुष्ट       4.शम्स-ओ-क़मर = सूरज-चाँद

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