डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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एक बहकी हुई अंगड़ाई की, आज रह रह के याद आती है

एक बहकी हुई अंगड़ाई की, आज रह रह के याद आती है।

अपनी बिछड़ी हुई परछाई की, आज रह रह के याद आती है।।

थे बहुत, वो न थे, चाहत थी जिनकी आँखों मे,

दरमियाँ बज़्म के तनहाई की, आज रह रह के याद आती है।

अपनी बिछड़ी हुई परछाई की, आज रह रह के याद आती है।।

गुजर गए, वो मेरे कूचे से, गैरों की तरह,

गूँज कानों में, उस सहनाई की, आज रह रह के याद आती है।

अपनी बिछड़ी हुई परछाई की, आज रह रह के याद आती है।।

वो शोखियाँ, वो अदाएं, वो चहकना उनका,

छोटी सी बात पे लड़ाई की, आज रह रह के याद आती है।

अपनी बिछड़ी हुई परछाई की, आज रह रह के याद आती है।।

हाले दिल अपना सुनाऊँ मैं तुम्हें क्या “सूरज”,

एक हसीना की बेवफ़ाई की, आज रह रह के याद आती है।

अपनी बिछड़ी हुई परछाई की, आज रह रह के याद आती है।।

                                                       डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

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