डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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उसने यारों मुझको पागल कर रखा है

उसने यारों मुझको पागल कर रखा है।

उसकी अदा ने दिल को घायल कर रखा है॥

 

अश्क़ों की बारिस को अब मैं रोकूँ कैसे,

आँखों को सावन का बादल कर रखा है॥

 

ख़ुद ही बढ़ के जाम उठा लेंगे महफिल में,

उसकी उलझन को मैंने हल कर रखा है॥

 

सूरज तेरी धूप भला क्या कर लेगी जब,

माँ ने मेरे सर पे आँचल कर रखा है॥

 

मेरे ख़यालों में छाया रहता है हरदम,

जीना मुश्किल उसने पल पल कर रखा है॥

 

जब से उसकी चाहत रूठी उसने तबसे,

दिल के घर आँगन को जंगल कर रखा है॥

 

ज़हरीले साँपों ने घेरा मुझको “सूरज”

मैंने जब से ख़ुद को संदल कर रखा है॥

 

                  डॉ. सूर्या बाली “सूरज”

 

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