डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

header photo

उसकी हर एक अदा मुझपे असर करती है

दिल को ज़ख्मी तो कभी चाक1 जिगर करती है।

उसकी हर एक अदा मुझपे असर करती है॥

 

टूट पड़ती है मेरे दिल पे बिजलियाँ जैसे,

हंसके जब भी वो मेरी सम्त2 नज़र करती है॥

 

जब भी जाती है किसी और से मिलने जुलने,

दिल जलाने के लिए मुझको ख़बर करती है॥

 

हर तरफ दर्द है सन्नाटा है तनहाई है,

मुझको अब उसकी कमी ज़ेरो-ज़बर3 करती है॥

 

जब भी आती है वो चुपके से मेरे कमरे में,

मेरी अलसाई हुई शब4 को सहर5 करती है॥

 

क्या कहूँ कैसे गुजरती है ग़रीबों की रात,

ज़िंदगी भूक के काँटों पे बसर करती है॥

 

मौत के मुंह से निकल आता है अक्सर इंसान,

जब दुआ चाहने वालों की असर करती है॥

 

कौन कहता है के तन्हा है सफ़र में “सूरज”

आज भी याद तेरी साथ सफ़र करती है॥

 

डॉ. सूर्या बाली "सूरज" 

 

1. चाक=फटा, 2. सम्त=तरफ 3. जेरो ज़बर=अस्त व्यस्त, 4. शब्= रात, 5. सहर=भोर

Go Back

Comments for this post have been disabled.