डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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इबादत कोई तेरे इश्क़ से बेहतर नहीं है

तेरे दर से बड़ा दुनिया में कोई दर नही है॥

इबादत कोई तेरे इश्क़ से बेहतर नही है॥

 

तेरा बस नाम लेने से ही मिल जाती है जन्नत,

तेरे दीदार से बढ़कर कोई मंज़र नही है॥

 

कोई ठोकर लगाये ये नहीं मंजूर मुझको,

ये मेरा दिल है कोई राह का पत्थर नही है॥

 

चलो अच्छा हुआ तुम हो गए आख़िर किसी के,

मुझे भी अब तुम्हें खोने का कोई डर नही है॥

 

सियासी हुक्मरानों देश के हालात देखो,

कहीं रोटी कहीं कपड़ा कहीं पे घर नही है॥

 

भला कैसे बुझेगी तश्नगी प्यासे लबों की,

यहाँ तो जामो-मीना साक़िया सागर नही है॥

 

मुझे भी ग़म है रिश्ता टूटने का अपना लेकिन,

मगर खुश हूँ की ये इल्ज़ाम मेरे सर नही है॥

 

तुम्हारा दिल करे जब भी हमें तुम आजमाओ

दग़ाबाज़ी हमारे ख़ून के अंदर नही है॥

 

जो कल आवाज़ दी उनको तो वो इतरा के बोले,

झिझकते क्यूँ हो आ जाओ कोई अंदर नही है॥

 

मेरे ईमेल तसवीरें रखे हो क्यूँ छुपाकर,

हटाते क्यूँ नहीं उनको मुहब्बत गर नही है॥

 

सफ़र अब ज़िंदगी का है कहाँ आसान “सूरज”,

कहीं मंज़िल कहीं रस्ता कहीं रहबर नही है॥

 

डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

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