डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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अब नहीं ज़ुल्म ज़माने का सहा जाता है

अब नहीं ज़ुल्म ज़माने का सहा जाता है॥

दिल में तूफान बग़ावत का उठा जाता है॥

 

कोई चलकर तो ग़रीबों की डगर भी देखे,

साथ छालों के सफ़र कैसे किया जाता है॥

 

सर पे जब छत न हो खाने के पड़े हों लाले,

जुर्म की राह पे कोई हो चला जाता है॥

 

दाने दाने को है मुहताज़ यहाँ पर इन्सां,

और गोदाम में आनाज सड़ा जाता है॥

 

मेरे मालिक तेरी दुनिया भी निराली कितनी,

कोई भूंखा तो कोई खा के मरा जाता है॥

 

आजकल झूठ पे होता है यकीं लोगों को,

और सच बात को भी झूठ कहा जाता है॥

 

एक दो दिन की अगर बात हो तो कर भी लूँ,

ज़िंदगी भर कहाँ समझौता किया जाता है॥

 

            डॉ. सूर्या बाली “सूरज”

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