डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

यकीं मुझको है तुम आओगे इक दिन

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अपने को आफ़ताब समझने लगे हैं आप

September 5, 2013 at 00:33

मुझको अब एक ख़्वाब समझने लगे हैं आप।

सूखा हुआ गुलाब समझने लगे हैं आप॥

 

यूं लखनऊ में रहके गुजारे जो चार दिन,

अपने को अब नवाब समझने लगे हैं आप॥

 

तस्वीर पर ज़रा सी जो तारीफ़ हो गयी,

अपने को माहताब समझने लगे हैं आप॥

 

दो चार जुगनुओं से ज़रा दोस्ती हुई,

अपने को आफ़ताब समझने लगे हैं आप॥

 

घर से निकल के आप जो सड़कों पे आ गए,

उसको ही इंकलाब समझने लगे हैं आप॥

 

दो चार ज़िंदगी में ग़लत लोग क्या मिले,

दुनिया को ही ख़राब समझने लगे हैं आप॥

 

आँखों में मेरी अब भी तो परदा हया का है,

क्यूँ हमको बेनक़ाब समझने लगे हैं आप॥

 

वो लोग आजकल हैं जो ख़बरों की सुर्खियां,

उनको ही कामयाब समझने लगे हैं आप॥

 

थोड़ी सी मिल गयी है जो “सूरज” की रौशनी,

अपने को बारयाब समझने लगे हैं आप॥

 

डॉ॰ सूर्या बाली “सूरज”

 

आफ़ताब= सूरज, माहताब=चाँद, इंकलाब= क्रांति, बारयाब= पहुंचा हुआ

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